ग्वालियर, नईदुनिया रिपोर्टर। संस्कार और नैतिक मूल्य ऐसी बुनियाद हैं, जिन पर कामयाबी की इमारत खड़ी होती है। पहले संयुक्त परिवारों में दादा-दादी बच्चों को कहानियों के जरिए सीख दिया करते थे। कहानियां सुनना बच्चों को अच्छा भी लगता था और खेल-खेल में उनके मन में संस्कार और नैतिक मूल्यों के बीज भी रोप दिए जाते थे।

आज आधुनिकता के दौर में यह परंपरा कहीं छूट सी गई है। 'नईदुनिया' अपनी पहल 'गुरुकुल' के जरिए इसी विधा से बच्चों को संस्कारित करने की कोशिश कर रहा है। इस क्रम में गुरुकुल का कारवां गोरखी हायर सेकंडरी स्कूल और पद्मा विद्यालय पहुंचा। यहां बच्चों को गुरुकुल की कहानी 'पशुओं के प्रति संवेदनशील व्यवहार, दुश्मन नहीं, दोस्त बनें' सुनाई गई।

कहानी में बच्चों को जानवरों और पक्षियों प्रति संवेदनशील बनने की सीख दी गई है। कहानी की भाषा सरल है और इसके मुख्य पात्र भी उनकी तरह स्कूली बच्चे हैं। इससे बच्चे कहानी से खुद को आसानी के साथ जोड़ सकते हैं। यह मीरा की कहानी है जो गौरैया के बारे में सुनती है तो सोचती है कि उसे कैसे वापस लाया जा सकता है।

इसके बाद वह अपने मम्मी-पापा के साथ बाजार जाकर दाना और सकोरा लेकर आती है। जब वह इन्हें छत पर रखती है सुबह उसे छत पर नन्हीं गौरैया के साथ तोते और गिलहरी दिखती है। उन्हें देख वो बहुत खुश होती है और स्कूल में सभी को बताती है। उसकी तरह उसके क्लास के दूसरे बच्चे भी जानवरों की मदद करते हैं। स्कूल प्रिंसिपल उनकी क्लास को फ्रेंड्स ऑफ एनीमल का पुरस्कार देते हैं।

समाज को संवेदनशील लोगों की जरूरत

एक अच्छे भविष्य के लिए हमें अपनी आगामी पीढ़ी को संवेदनशील बनाने की जरूरत है। यह संवेदनशीलता सिर्फ इंसानों के प्रति नहीं, बल्कि जानवरों और प्रकृति के प्रति भी होनी चाहिए। बच्चों को समझाना होगा कि प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए पशु-पक्षियों की कितनी जरूरत है। इस दिशा में गुरुकुल का प्रयास सराहनीय है। अशोक कुमार श्रीवास्तव, प्रिंसिपल, पद्मा विद्यालय

Posted By: Nai Dunia News Network

fantasy cricket
fantasy cricket