विजय सिंह राठौर, ग्वालियर। घाटीगांव ब्लॉक सिमिरिया गांव स्थित चक के पुरा में प्रायमरी स्कूल के शिक्षक बीते 12 साल से बंजारों को परिवार नियोजन का पाठ पढ़ा रहे हैं। इस कारण यहां बहुसंतान व बाल विवाह का चलन लगभग खत्म हो गया है। इस प्रयास की कहानी भी बड़ी रोचक है। 2006 में अपनी पोस्टिंग के दौरान प्रधानाध्यापक रामसेवी जब बच्चों का परिचय ले रहीं थी तो क्लास में मौजूद 51 बच्चों में से 44 ने अपने दादा का नाम सोहन सिंह बताया।

बाकी बच्चे भी शायद बंजारे ही थे। इतने सारे बच्चों के दादा एक ही हैं, यह बात थोड़ी चौंकाने वाली थी। सच्चाई जानी तो मालूम हुआ कि दादा सोहन के 6 बेटे और उनसे 40 नाती, नातिनी हुए। इनमें भी कुछ की संतान हो चुकी थीं, जो स्कूल आते थे।

बस यहीं से रामसेवी ने तय किया कि वह बंजारा समाजा में परिवार नियोजन की अलख जगाएंगी। आज बारह साल बाद इस समुदाय की तस्वीर यहां कुछ बदली सी दिखाई देती है। यह उन प्रयासों का नतीजा है, जो यहां के शिक्षकों द्वारा विगत 12 साल से लगातार किए जा रहे हैं। रामसेवी चौहान ने बताया कि वे और शिक्षक मानसिंह इमले बंजारों को पेरेंट्स मीटिंग के बहाने बुलाते थे और उन्हें कम बच्चे पैदा करने की समझाइश देते थे। लेकिन उनकी बात बंजारों द्वारा अनसुनी कर दी जाती। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे घर-घर जाकर बंजारा समाज की महिलाओं से बात करतीं, खासकर युवा पीढ़ी को समझातीं है।

तीज त्योहारों को बनाया जरिया

बाबा की चूरी व होली पर होने वाले खाग पर्व समेत बंजारों के अन्य सामुदायिक तीज-त्योहारों व शादी समारोहों में भी शिक्षक सहभागिता निभाते हैं। ऐसे में शिक्षकों का सीधा जुड़ाव बंजारों के परिवार से हो गया। इसके बाद उनकी बात को खासी तवज्जो मिलने लगी। यही कारण है कि अब खानाबदोश व घुम्मकड़ जनजाति के तौर पहचाना जाने वाला बंजारा समाज की महिलाएं परिवार नियोजन को अब काफी संजीदगी से लेती हैं।

मोती-मणियां नहीं होने देते बाल विवाह

बंजारों के इस स्कूल में हर साल पूर्व छात्र मिलन समारोह होता है। स्कूल से पढ़कर निकले लड़कों को मोती और लड़कियों को मणियां कहकर बुलाया जाता है। कुछ पूर्व विद्यार्थी शहरों में नौकरी करते हैं, एक-दो पुलिस में भी हैं। अब ये मोती और मणियां बंजारा समाज में बाल विवाह व बहुसंतान के चलन का भी विरोध करते हैं।

Posted By: Hemant Upadhyay