Gwalior Virendra Tiwari Column: वीरेंद्र तिवारी, ग्वालियर नईदुनिया। आप प्रधानमंत्री मोदी के लाख आलोचक हों, लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि सफाई को लेकर जो जागरूकता पूरे देश में आई है उसका पूरा श्रेय पीएम मोदी को ही जाता है। याद करिए इससे पहले कब स्वच्छता को लेकर ऐसी राष्ट्रव्यापी प्रतिस्पर्धा होती थी? पूरे विश्व में हम कचरा और गंदगी को लेकर बदनाम थे। पर्यटक नाक पर रूमाल रखकर जहां तहां दिखाई देते थे, लेकिन अब स्थिति बहुत बदल चुकी है। सफाई भी मुद्दा हो सकता है यह पीएम मोदी ने ही सिखाया। साल दर साल इस प्रतियोगता के नियम कड़े होते जा रहे हैं। हर शहर में स्वच्छ सर्वेक्षण को एक उत्सव के रूप में मनाया जाना किसी वृहद अभियान के सफलता की कहानी कहता है। उम्मीद है पश्चिम बंगाल जैसे राज्य भी राजनीति से परे जाकर सर्वेक्षण में शामिल होना शुरू कर देंगे।

जय किसान सिर्फ नारा न होः लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार कृषि कानूनों पर मचा गतिरोध प्रधानमंत्री द्वारा कानून वापसी की घोषणा के साथ समाप्त हो गया। लेकिन आम किसानों के मन में अभी पहले के जैसे ही खेती और खुद के भविष्य को लेकर असमंजस्य है। चूंकि कृषि कानून लागू ही नहीं हुए थे लिहाजा अब यह बात हमेशा अनिर्धारित ही रहेगी कि इन कानूनों से सरकार के दावे के मुताबिक किसानों की दशा दिशा बदल जाती या वह कारपोरेट कंपनियों के गुलाम बन जाते। नफा-नुकसान के गणित से हटकर सच्चाई यह भी है कि कृषि प्रधान देश में किसान और उसकी हालत पर पहली बार प्राइम टाइम में चर्चा हुई या देश दुनिया के अखबारों के फ्रंट पेज पर जगह पाई। किसान इसे ही अपनी छोटी सी जीत इस संदर्भ में जरूर मान सकते हैं, लेकिन किसानों की सच में जय तभी होगी जब हर तरफ से प्रयास में ईमानदारी हो।

जनसेवा की अग्नि परीक्षा दें नेतापुत्रः पिछले कुछ दिनों में पूरे अंचल में नेता पुत्रों के एकाएक सक्रिए होने से राजनीति में भी हलचल मच गई है। सारे पुत्र दिग्गजों के हैं और उन दिग्गजों के पास कार्यकर्ताओं की फौज है, लिहाजा इन पुत्रों की लांचिंग में अधिक परेशानी नहीं आएगी। लेकिन मेरा कहना है कि यदि हमें असली लीडर्स चाहिए तो इन नेता पुत्रों को भी जनसेवा की अग्नि परीक्षा में पास होने के बाद ही अपने दम पर राजनीति में प्रवेश करने देना चाहिए। उनके आगे-पीछे चलने वाली भीड़ उनके पिता की न होकर खुद के परिश्रम से जोड़े गये युवाओं की हो। ऐसा हुआ तो ही भविष्य के इन नेताओं को राजनीति की असली परिभाषा समझ आएगी, नहीं तो एक बड़े नेता को अभी भी 'बच्चा" ही समझा जाता है। उन पर जो मीम बनते हैं वह पैराशूटी किसी भी नेता पुत्र बनना शुरू हो सकते हैं।

वर्चुअल हों लेकिन किस कीमत परः जिस तेजी से दुनिया वर्चुअल हो रही थी उसकी रफ्तार में कोविड काल के इन दो सालों ने डबल इंजन लगा दिया है। दफ्तर,स्कूल,वैवाहिक,राजनीतिक रैलियां तक स्क्रीन पर सिमट गईं। अब टेक कंपनियां इसे नये स्तर पर लेकर जा रही हैं। आप वह वातावरण भी महसूस कर सकेंगे जिसकी कमी अभी अखरती है। यानी दूर रहकर भी आप मित्र या परिवारजन का साथ महसूस कर सकेंगे। मेरे मित्र के 16 साल के बेटे को अब वर्चुअल क्लास की इतनी अधिक आदत पड़ गई है कि उसे स्कूल जाना बोझ लग रहा है। अमेरिका में लोग काम करने की पहली शर्त वर्क फ्राम होम की रखने लगे हैं। घरों में एक कक्ष अब स्कूल क्लास या दफ्तर बन चुका है। डर इस बात का है कि अंधी दौड़ में रिश्ते भी आभासी बन गये तो मानव सभ्यता की पूरी अवधारणा पर ही प्रश्नचिंह लग जाएगा।

Posted By: vikash.pandey

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