वीरेंद्र तिवारी. ग्वालियर। शहर में कुछ दिनों पहले भव्य शिलान्यास कार्यक्रम हुआ था जिसमें केद्रीय परिवहन मंत्री गडकरी आए थे। एलिवेटेड रोड से लेकर एक दर्जन भर योजनाओं के कामों का नारियल फोड़ गये। कुछ दिनों बाद एक और भव्य कार्यक्रम होने जा रहा है, वह है एयरपोर्ट के नवीन टर्मिनल का। सुना है उसमें केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह आ रहे हैं। उड्डन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के विभाग की अंचल के लिए यह सबसे बड़ी सौगात होगा। हालांकि कुछ दिनों से नईदुनिया ने ऐसे विकास कार्यों की सुध ली है जिनकी खबर कोई नहीं ले रहा। जो अनादी काल से चल रहे हैं और चलते ही जा रहे हैं लेकिन पूरे होने का नाम ही नहीं ले रहे। चाहे वह शहर में बन रहे दो आरओबी हों या रेलवे स्टेशन के पुनर्विकास की योजना, जिला कोर्ट की नई बिल्डिंग हो या हजार बिस्तर का अस्पताल। किसी को चार साल पहले पूरा होना था किसी को दो साल पहले, बावजूद इसके अब भी कोई बताने को तैयार नहीं कि इनके लोकार्पण का फीता कब कटेगा।

कमल के 'नाथ'

राहुल गांधी की पदयात्रा से भारत कितना जुड़ा यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन मप्र में कांग्रेस लगातार कमजोर और टूटती सी जा रही है। अचंभा तब है जब बहुत पुराने कार्यकर्ताओं पर मुसीबत के समय पार्टी खड़ी नहीं हो रही और जब मजबूरी में उन्हें पार्टी छोड़नी पड़े तो प्रदेश के 72 वर्षीय अध्यक्ष कमलनाथ यह बयान देते हैं कि जिनको पार्टी छोड़ना है छोड़ दें मैं अपनी गाड़ी भी दे दूंगा। कमलनाथ की प्रदेश में पिछले चार सालों की राजनीति मुझे कभी समझ नहीं आई। बनी हुई बेहतर सरकार इसी हठधर्मिता से चली गई थी। अब खुरई के पूर्व विधायक अरुणोदय चौबे और अटेर के पूर्व विधायक हेमंत कटारे पर की गई टिप्पणियों से आम कार्यकर्ताओं का तो मनोबल टूटेगा ही।

और अंत में, नवरात्र का उपवास न करें

हम भारतीय गजब विरोधाभास में जीते हैं। ढिंढोरा पीटते हैं कि भारतीय संस्कृति में नारियों का स्थान सर्वोच्च है। यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:। मनुस्मृति के तीसरे अध्याय का उपरोक्त वाक्य और साल भर देश के हर कोने से छोटी बच्चियों से लेकर हर उम्र की महिलाओं के साथ दरिंदगी की खबर से समाज का कितना दोगुलापन झलकता है। नवरात्र के पहले देवभूमि उत्तराखंड में होटल रिसेप्शनिस्ट को इसलिए मारकर फेंक दिया जाता है क्योंकि उसने होटल के मेहमानों को स्पेशल सर्विस देने से मना कर दिया था। स्पष्ट सुबूतों के बाद पुलिस चार दिनों तक एफआइआर नहीं लिखती क्योंकि मामला भाजपा के पूर्व मंत्री के रिसार्ट का था। दरअसल महिला सुरक्षा पर समाज के कांसेप्ट हिले हुए हैं, इसीलिए हम श्लोक के पीछे अपने कृत्य छिपा लेते हैं। यदि दिल में यदि मातृशक्ति के लिए इज्जत नहीं है तो कृपया आप नवरात्र में मां की आराधना का दिखावा न करें।

लड़ते-लड़ते कैसे कटेंगे रास्ते

नगर निगम ग्वालियर में जब कांग्रेस की महापौर की ताजपोशी हुई थी और उसके बाद नगर निगम परिषद में सभापति भाजपा का बन गया था तभी यह तय हो गया था कि अब सबकुछ ठीक नहीं चलेगा। यह शहर का बेडलक कहें कि जब विकास के लिए सबसे स्थायी, लयबद्ध और एग्रेसिव नगर सरकार की जरूरत थी तब शहर को खिचड़ी मिली है। यदि अंचल की राजनीति में दो केंद्रीय मंत्रियों के ध्रुव हैं तो इस वक्त नगर निगम में तीन शक्ति केंद्र बन चुके हैं। महापौर, जो शक्तिहीन हैं और पावर बैकअप विधायक का लेना पड़ रहा है। दूसरा भाजपा सभापति और सत्ताधारी पार्षद सत्ताधारी पार्टी से होते हुए भी कांग्रेसी एमआइसी व अफसरों की लाबी के पाट में फंसा है। तीसरा धड़ा है निगमायुक्त और उनसे जुड़े अधिकारियों का, जो फिलहाल खुद की पोजिशन को लेकर कंफ्यूजन में हैं, लेकिन हैं काफी पावरफुल। न महापौर की सुन रहे न भाजपा पार्षदों की। मेरी सलाह है तीनों मिलकर यूपीए सरकार की तरह एक कामन मिनिमम प्रोग्राम बना लें, शहर को कुछ तो मिलेगा लड़ाई के अलावा।

Posted By: anil tomar

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