Gwalior Water Conservation News: ग्वालियर, नईदुनिया प्रतिनिधि। सामाजिक सरोकारों के तहत 'नईदुनिया ने विश्व जल दिवस से 'सहेज लो हर बूंद अभियान शुरू किया था। इसके अंतर्गत ऐसे जलदूतों के प्रयासों को प्रकाशित किया, जो जल संरक्षण की दिशा में लगातार जुटे हुए हैं और वे जल की हर बूंद को सहेजने में कामयाब हो रहे हैं। इसी क्रम में गुरुवार को वेबिनार रखा गया। इसमें ग्वालियर, भिंड, मुरैना, शिवपुरी, श्योपुर, दतिया और डबरा के साथ-साथ बुंदेखखंड तक के जलदूतों ने भाग लिया। विशेषज्ञ के रूप में नगर निगम के वाटर हार्वेस्टिंग के नोडल अधिकारी शिशिर श्रीवास्तव मौजूद थे, जिन्होंने सवालों के जवाब भी दिए। जलदूतों का कहना है जल संरक्षण को लेकर हमें जागरूक होना पड़ेगा, नहीं तो आगे चलकर और भी भयाभय स्थिति सामने आएगी। अब वेस्टेज पानी को उपयोगी बनाने के लिए प्रयास तेज करने होंगे। इसकी मदद से दैनिक कार्य आसानी से पूरे होंगे।

हर साल गंभीर होती जा रही है स्थितिः मुरैना के विनायक तोमर ने बताया हर साल पानी की भयाभय स्थिति होती जा रही है। इसका जिक्र उन्होंने अपनी किताब में किया है। उन्होंने बताया पूर्व में जल ही जीवन का स्लोगन था, जो हालातों से बदलकर जल है तो कल है हो गया है। यह स्पष्ट भी है, अगर जल होगा तभी हमारा भविष्य खूबसूरत होगा। हम हर दिन 1.3 प्रतिशत पानी का उपयोग पीने के लिए कर रहे हैं। 97.2 प्रतिशत पानी सागरों में हैं, 2 प्रतिशत ग्लेशियर और 0.6 प्रतिशत अंडरग्राउंड है, जिसका उपयोग हम सिंचाई आदि में करते हैं। इसके अलावा 0.01 प्रतिशत पानी नदियों और झीलों में बचा है। अब हमें जल स्रोतों की तरफ ध्यान देना चाहिए। आइआइटीटीएम के असिस्टेंट प्रोफसर डा. चंद्रशेखर बरुआ ने बताया प्रबंधन जल संरक्षण को लेकर काफी चिंतित है। परिसर में स्थित छह बोर सूख चुके हैं। इससे हास्टल में रहने वाले विद्यार्थियों के साथ-साथ संस्थान से जुड़े कार्य आसानी से पूरे नहीं हो रहे हैं। स्थिति को सुधारने के लिए प्रबंधन ने वाटर हार्वेस्टिंग कराने की प्रयास किया। आने वाले 15 दिनों में कार्य पूरा हो जाएगा। वाटर हार्वेस्टिंग करा लेने से इस बार बारिश का पानी संरक्षित हो सकेगा। रोटेरियन प्रभात भार्गव ने बताया जल संरक्षण के लिए अब हमें उन स्रोतों को खोलने की तैयारी करनी चाहिए, जो ध्यान न देने के कारण बंद हो गए हैं। पब्लिक प्लेस और पार्कों को वाटर हार्वेस्टिंग से जोड़ना चाहिए। कई साल पहले स्वर्ण रेखा और मुरार नदी से बांधों में पानी पहुंचता था। शहर से सटे हर बांध में छह से आठ लाख लीटर पानी रहता था। अब मानवीय अभिलाषाओं के कारण स्थितियां बदल चुकी हैं।

जल है तो सब कुछ हैः शहर की सावित्री श्रीवास्तव का कहना था जल है तो सब कुछ है। इसी बात को ध्यान में रख वे और उनकी टीम पूरे भारत में जल संरक्षण के लिए कार्य कर रही है। उनके प्रयास शिवपुरी लिंक रोड से शुरू हुए। यहां उन्होंने अपनी टीम के साथ 40 ऐसी संरचनाएं तैयार कीं, जिनकी मदद से सड़क या फिर अन्य जगहों पर पानी एक जगह पर एकत्रित हुआ। 16 कुओं को रिचार्ज करने में सफलता पाई। रोटेरियन राममोहन त्रिपाठी ने बताया उन्होंने अपनी टीम के साथ रायरू डिसलरी क्षेत्र में स्थित बीलपुरा को नए टूरिस्ट प्वाइंट के रूप में विकसित कर दिया है। योजना को पूर्ण करने में भले ही 45 लाख रुपये का खर्च आया हो, मगर आसपास के 25 गांवों का जल स्तर बढ़ चुका है। जीवाजी विवि के एचके शर्मा का कहना है हमें साइंस और टेक्नोलाजी की मदद से वेस्ट पानी को उपयोगी बनाना होगा। भिंड के रामसुजान ने कहा कि चिंता कम होती बारिश ने बढ़ाई हैं। यह सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि हम जागरूक नहीं हैं। आइएचएम के अभिनव भट्ट ने बताया जल समस्या से निपटने के लिए प्रबंधन ने वाटर हार्वेस्टिंग की प्रक्रिया को अपना लिया है। छतों से पाइप लाकर तकनीक की मदद से पानी स्टोर करने की तैयारी कर ली है। छतरपुर के डीडी तिवारी ने बताया वे अपनी टीम के साथ साल 2013 से तालाबों पर काम कर रहे हैं।

वर्जन-

नगर निगम जल संरक्षण की दिशा में लगातार काम कर रहा है। कई साल पुराने तालाब और कुओं को खोज लिया गया है, जिन्हें लोगों ने मिट्टी से बंद कर दिया था। मुरार नदी से कई बांधों की कनेक्टविटी थी, जो स्रोताें के बंद होने से टूट चुकी है। हमें जल संरक्षण की तरफ बढ़ना चाहिए। सबसे पहले तो हमें वाटर लेवल को ध्यान देना चाहिए। वाटर हार्वेस्टिंग कराने से हम जल स्तर को 250 से 70 फीट तक ला सकते हैं।

शिशिर श्रीवास्तव, नोडल अधिकारी, वाटर हार्वेस्टिंग

Posted By: vikash.pandey

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