ग्वालियर। छह अप्रैल चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रम संवत्‌ 2076 को नवसंवत्सर का प्रारंभ होगा। इस बार नवसंवत्सर का नाम परिधावि होगा। शनिवार के दिन नववर्ष प्रारंभ होने के कारण इस बार नवसंवत्सर के राजा शनिदेव होंगे। साथ ही उनके मंत्री मण्डल में शनि के पिता सूर्य रहेंगे। मंत्री मण्डल में सूर्य, मंगल, चंद्र को भी विशेष पद मिलेगा। पंचागीय गणना से वर्ष फल देखें तो हिन्दू नववर्ष मिश्रित फल देने वाला रहेगा। वर्षा व धान्य की दृष्टि से संवत्सर मध्यम फलदायी होगा। वहीं फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले होली का पर्व इस बार 20 मार्च को मनाया जाएगा। यह पर्व इस बार शुभ अमृत मुहूर्त में मनाया जाएगा।

ज्योतिषाचार्य डॉ. दीपक गोस्वामी के अनुसार विक्रम संवत्सर परिधावि की शुरुआत शनिवार के दिन हो रही है। मान्यता यह है कि जिस दिन संवत्सर का आरंभ होता है, उस दिन के अधिपति संवत्सर के राजा होते हैं। इसलिए इस बार संवत्सर के राजा शनि होंगे। मंत्रीमंडल में शामिल चार ग्रहों के पास नौ महत्वपूर्ण विभाग रहेंगे। वर्षभर इनका प्रभाव अलग-अलग रूपों में नजर आएगा। इस बार वर्षा की स्थिति व धान्य का उत्पादन मध्यम रहेगा। वर्षा ऋतु में बारिश की स्थित को श्रेष्ठ बनाने के लिए धार्मिक अनुष्ठान की आवश्यकता रहेगी। पशु धन में संक्रमण, समाज में अस्थिरता तथा हिंसात्मक घटनाएं भी सामने आएंगी। शत्रु राष्ट्रों से युद्ध की स्थिति तथा राजनीतिक परिवर्तन के योग भी बनेंगे।

ऐसा रहेगा ग्रहों का प्रभाव

राजा शनि : जनमानस आध्यात्मिक अनुभूति करेगा। वर्षा की दृष्टि से प्राकृतिक प्रभाव परेशानी पैदा करेगा। महंगाई भी बढ़ेगी, जिसके कारण मुद्रास्फीति प्रभावित होगी। साथ ही कई जगह अघोषित युद्ध की स्थिति निर्मित होगी।

मंत्री सूर्य : पूर्वोत्तर में उत्तम कृषि तथा धान्य की स्थिति सुदृढ़ होगी। फलों की अधिक खेती होने से रस पदार्थों के भाव में मंदी रहेगी।

सस्येश मंगल : पशुधन पर संकट की स्थिति रहेगी। संक्रमण का प्रभाव बढ़ेगा। दक्षिण के कुछ प्रांतों में पेयजल संकट उत्पन्न होगा। सामाजिक अस्थितरता तथा हिंसात्मक घटना बढ़ेगी।

धान्येश चंद्र : वर्षाकाल में आध्यात्मिक अनुष्ठान से वर्षा की स्थिति श्रेष्ठ होगी। पशुधन की सुरक्षा का लाभ मिलेगा। आम जनमानस के मध्य आपसी सौहार्द बढ़ेगा।

मेघेश शनि : पश्चिमोत्तर राष्ट्रों में प्राकृतिक तथा सामुदायिक घटना बढ़ेगी। खड़ी फसलों को नुकसान हो सकता है। कहीं कहीं खंड वृष्टि के योग बनेंगे।

रसेश गुरु : जुलाई के बाद प्राकृतिक सहयोग होने से जल की स्थिति अनुकूल होगी। जलस्रोतों के परिपूर्ण होने की स्थिति बनेगी। प्राचीन परंपरागत औषधीय की उत्पत्ति श्रेष्ठ रहेगी।

फलेश शनि : पुष्प तथा फलों की खेती में कुछ उत्पादक स्थानों पर कमी रहेगी। शीत ऋतु में हिमपात होने से शीत लहर में वृद्घि होगी।

धनेश मंगल : विश्व में अनेक राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था में उतार चढ़ाव दिखाई देगा।

सेनापति शनि : अनेक राष्ट्रों में राजनीति के चलते आंदोलन, प्रदर्शन, विरोध तथा अस्थिरता दिखाई देगी। प्राकृतिक आपदा से जनता प्रभावित होगी।

अमृत योग में मनाई जाएगी होली

ज्योतिषाचार्य डॉ. दीपक गोस्वामी के अनुसार होलिका दहन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि में किया जाएगा। 20 माच की रात्रि 8 बजकर 58 मिनट से रात्रि 12 बजकर 34 मिनट तक होलिका दहन करना शुभ है। वहीं पूर्णिमा 20 मार्च की सुबह 10 बजकर 44 मिनट से प्रारंभ होकर दूसरे दिन 21 मार्च को सुबह 7 बजकर 12 मिनट तक रहेगी।

भद्रा पुंछ :- 20 मार्च को सुबह 3 बजकर 23 मिनट से 6 बजकर 24 मिनट तक रहेगी। जबकि भद्रा मुख 6 बजकर 24 मिनट से 8 बजकर 7 मिनट तक रहेगी।

यह राशि वाले इन रंगों से खेले होली

मेष- गुलाबी रंग

वृषभ- चमकीला रंग

मिथुन- हरा रंग

कर्क- सफेद रंग

सिंह- लाल रंग

कन्या- हरा रंग

तुला- नारंगी रंग

वृश्चिक- लाल रंग

धनु- पीला रंग

मकर- बैगनी रंग

कुंभ- नीला रंग

मीन- पीला रंग

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