ग्वालियर.नईदुनिया प्रतिनिधि। सोनचिरैया अभ्यारण एवं मुरार के आसपास के जंगल शिकारियों की पसंदीदा जगह बने हुए हैं। यहां पर निवास करने वाले मोंगिया जाति के आदिवासी अपने भोजन के लिए जंगली जानवरों का शिकार करते हैं। यह लोग जानवरों का शिकार करने के लिए फंदे लगाते हैं। इन फंदों में वह जंगली सुअर, हिरण, नीलगाय का फंसाकर शिकार करते हैं। इनके द्वारा दो तरीके के हथियारों से शिकार करते हैं। इनमें पहली है उनके हाथ से बनाया गया गैंतीनुमा हथियार एवं बंदूक। फंदे में फंसे जानवरों को यह लोग इन हथियारों से शिकार करते हैं। इन शिकारियों के फंदे में फंसे चार जानवरों को नगर निगम चिडियाघर एवं वनविभाग में मिलकर इन जानवरों को रैस्क्यू किया है। इनमें दो तेंदुए और दो लक्कड़बग्गे हैं, शिकारियों के फंदे से निकलने के चक्कर में इन जानवरों द्वारा लगाए गए जोर के कारण इनके पंजे ही अलग हो गए हैं। इसके चलते अभी इनमें से तीन जानवरों को नगर निगम के चिडियाघर में रखा गया है, जबकि एक मादा तेंदुए को इलाज के लिए भोपाल भेज दिया गया है।

मुरार क्षेत्र के पीछे गांवों से सटे जंगल एवं, घाटीगांव, और नलकेश्वर में सोनचिरैया अभयारण में जंगली जानवराें का खुले आम शिकार हाे रहा है। घाटीगांव में जंगली सुअर, नीलगाय एवं हिरणों के शिकार के लिए शिकारियों द्वारा फंदे लगाए जाते हैं। यह फंदे लोहे के तारों के होते हैं जिन्हें पेड़ों से बांध दिया जाता है और जमीन पर रखकर मिट्टी अथवा पेड़ के पत्तों से छिपा दिया जाता है। जंगली जानवर जब पानी पीने अथवा भोजन की तलाश में निकलता है तो इन फंदों में उनके पैर फंस जाते हैं। बाद में शिकारी आकर इनका शिकार कर लेते हैं। ग्वालियर के चिडियाघर में बंद दो लक्कड़बग्गे एवं एक नर तेंदुए को लोगाें की निगाहों से दूर रखा जाता है। क्योंकि वान्य प्राणी अधिनियम के तहत इन जानवरों को खुले में लोगों को देखने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है। इन जानवरों की देखभाल के लिए चिडियाघर के कर्मचारी तैनात हैं जो कि इन्हें भोजन, पानी एवं दवाईयां देते हैं।

Posted By: anil.tomar

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