ग्वालियर, नईदुनिया प्रतिनिधि। सुप्रीम कोर्ट ने उस एसएलपी में नोटिस जारी कर दिए हैं, जिसमें शासन ने नगरीय निकाय के अध्यक्ष पद के आरक्षण के स्टे को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने मनवर्धन सिंह व रवी बंसल को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। छह दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में फिर से सुनवाई होगी। शासन ने 12 मार्च 2021 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश में आरक्षण की प्रक्रिया पर रोक लगाई थी, जिससे नगरीय निकाय चुनाव पर रोक लग गई है।

हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में नगर निगम के महापौर, नगर पालिका अध्यक्ष व नगर पंचायत अध्यक्षों के आरक्षण को चुनौती देने के लिए अलग-अलग नौ जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं। युगलपीठ में सभी जनहित याचिकाओं को एक साथ सुना जा रहा है। कोर्ट ने 12 मार्च 2021 को अंतरिम आदेश पारित करते हुए दो नगर निगम, 79 नगर पालिका, नगर पंचायत के आरक्षण की प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी और शासन से जवाब मांगा था। ये याचिकाएं जबलपुर की प्रिसिंपल बेंच में स्थानांतरित हो गई हैं। शासन ने कोर्ट के समक्ष तर्क दिया था कि सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर दी है। कोर्ट ने रोक बरकरार रखते हुए याचिकाओं की तारीख बढ़ा दी। सुप्रीम कोर्ट में शासन की एसएलपी पर सुनवाई हो गई है। शासन ने मनवर्धन सिंह व रवी बंसल की जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

पंचायत आरक्षण के अध्यादेश काे हाईकाेर्ट में चुनाैतीः हाई कोर्ट की युगल पीठ ने उस मामले में नोटिस जारी कर दिए, जिसमें पंचायत के आरक्षण को लेकर मध्य प्रदेश सरकार ने धारा नौ ए जोड़ी है। भिंड निवासी कालूराम सोनी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता कृष्णा कार्तकेय शर्मा ने तर्क दिया है कि पंचायत चुनाव को लेकर हाल ही में राज्यपाल ने एक अध्यादेश जारी किया है। इसमें धारा नौ ए जोड़ा गया है। इस धारा के जोड़े जाने से पंचायत चुनाव पुरानी व्यवस्था से हो सकेंगे। यानी पंचायत के आरक्षण में रोटेशन करने की जरूरत नहीं है, जो पंचायत जिस वर्ग के लिए आरक्षित थी, वह दूसरी बार भी उसी वर्ग के लिए आरक्षित रहेगी। संविधान के अनुच्छेद 243 में उल्लेख है कि आरक्षण में रोटेशन प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। एक चुनाव के बाद दूसरे चुनाव में आरक्षण बदलना चाहिए। जिससे समाज के अन्य वर्ग को भी चुनाव प्रक्रिया लाभ मिल सके। सरकार ने जो अध्यादेश जारी किया है, वह पंचायत राज अधिनियम के विपरीत है। लोगों के संवैधानिक अधिकारों का हनन है।

लंबे समय से नहीं हुए हैं पंचायत चुनावः पंचायतों का कार्यकाल काफी समय पहले हो गया है, लेकिन कोविड-19 के संक्रमण के चलते चुनाव नहीं हो सके है। पुराने सरंपच हैं, उन्होंने पांच साल से ज्यादा समय सरपंच पद संभाल लिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग चुनाव को लेकर बेसब्री से इंतजार में है, लेकिन सरकार ने नया अध्यादेश लाकर धारा नौ ए जोड़ी है। उसे कोर्ट में चुनौती दी गई है।

Posted By: vikash.pandey

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