Gwalior naidunia. इंजेक्शन का डोज-अजय उपाध्याय

कमरा नंबर 512

जिला अस्पताल का कमरा नंबर 512 चर्चा का विषय बना हुआ है। असल में यह सैंपलिंग के नोडल अधिकारी का कमरा है। जहां पर यह कमरा है वहां पर कोरोना सैंपलिंग का काम होता है। इसके कारण वहां पर सामान्य मरीजों की ओपीडी शुरू नहीं हो पा रही है। जिला सरकार के मुखिया इस स्थान से सैंपलिंग हटाकर पास में बनी फीवर क्लीनिक में पहुंचाना चाहते हैं। वह दो बार निर्देश भी दे चुके, लेकिन मुखिया के निर्देश का पालन पूरा जिला अस्पताल प्रबंधन नहीं कर पा रहा है। असल में कलेक्टर बुधवार को अस्पताल की व्यवस्थाओं को दखने पहुंचे थे। उन्होंने ट्रॉमा से सैंपलिंग हटाकर फीवर क्लीनिक में शुरू करने के लिए कहा। सिविल सर्जन खुद गुस्र्वार को ट्रॉमा में ओपीडी शुरू कराने पहुंचे पर कमरा नंबर 512 पर ठिठक गए, लेकिन वह भी पास में स्थित सैंपलिंग को फीवर क्लीनिक में शिफ्ट नहीं करा पाए।

हाईफ्लो ने अटकाई जेएएच प्रबंधन की सांसें-

जेएएच के सुपर स्पेश्ाियलिटी हॉस्पिटल में हुई आगजनी ने अस्पताल प्रबंधन की सांसें अटका दी हैं। उसका कारण यह है कि जब यह मशीनें भोपाल से सप्लाई की गई तो स्टोर से लेकर अधीक्षक ने इनकी गुणवत्ता को ठीक बताया था। अब ये मशीनें मरीजों के लिए खतरानाक साबित हो रही हैं। दो माह पहले मशीन में विस्फोट हुआ तो वह तो अस्पताल प्रबंधन ने दबा दिया, लेकिन पिछले शनिवार को हुए विस्फोट ने मशीनों की गुणवत्ता को उजागर कर दिया। इस अग्निकांड के कारण तीन मरीजों को जान गंवानी पड़ी। इसके कारण यह मामला प्रदेश व केंद्र सरकार तक जा पहुंचा। प्रबंधन का तर्क है कि सप्लाई भोपाल से हुई तो गुणवत्ता की जांच भी वहीं होना चाहिए। यहां पर डाक्टर इलाज देना जानते हैं न कि मशीनों की गुणवत्ता की जांच करना। खरीद में कहां गड़बड़ी हुई वह अब कौन बताए।

दहशत में निजी अस्पताल-

निजी अस्पताल के संचालकों की इन दिनों दिल की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। उनकी धड़कनें बढ़नी भी चाहिए, क्योंकि वह बिना मानक के अस्पताल खोलकर मनमर्जी का इलाज और फीस जो वसूल रहे हैं। गजब की बात तो यह है कि इन अस्पतालों पर आजतक स्वास्थ्य महकमे ने निगाह तक न डाली थी, लेकिन अब स्वास्थ्य विभाग का अमला बदला तो उनकी कार्यशैली भी बदल गई। उन्होंने प्रशासन के निर्देश पर ऐसे अस्पतालों की सूची तैयार की है जहां पर मानक पूरे नहीं हो रहे थे। अब उन अस्पतालों पर एक के बाद एक कार्रवाई शुरू हो गई। ऐसे में निजी अस्पताल संचालकों को समझ नहीं आ रहा है कि वह करें तो क्या करें। सीएमएचओ का भी स्पष्ट कहना है कि अस्पताल चलाना है तो व्यवस्थाएं सुधार लो नहीं तो कार्रवाई के लिए तैयार रहो। जिसको लेकर निजी अस्पताल संचालकों में दहशत का माहौल है।

20 लाख की दवा डकारने वाले जमे बैठे-

गरीबों के लिए आने वाली 20 लाख रुपये कीमत की दवाएं जेएएच के स्टोर से बंदर बांट हो गईं। अधीक्षक की नजर में आई तो पूरे मामले पर जांच बैठ गई। दवाएं किसने और कहां पर खपाई, यह सभी को पता है। मगर बोलना कोई नहीं चाहता है। असल में अधीक्षक जहां एक ओर जांच करा कर दूध का दूध व पानी का पानी करना चाहते हैं तो वहीं उनके साथी पूरी जांच की लीपापोती के लिए नजर लगाए हुए हैं। गजब की बात यह है कि दवा डकारने वाले भी ठाकुर जी का स्मरण कर अपनी कुर्सी पर जमे बैठे हैं। ऐसे में बड़ा धर्मसंकट यह खड़ा हो गया कि जिसके साथ ठाकुर जी का हाथ उसका कौन बिगाड़े काज। प्रंबधन न तो जमे बैठे लोगों को हटा पा रहा और न हीं जांच पूरी कराने की हिम्मत जुटा पा रहा।

Posted By: anil.tomar

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