डॉ.अमरनाथ गोस्वामी, ग्वालियर। एट्रोसिटी के विरोध का गढ़ बने ग्वालियर-चंबल अंचल में सवर्णों के मौन प्रहार ने भाजपाई सियासतदारों की चूलें हिला दी हैं। एट्रोसिटी के अंडर करंट ने अधिकांश प्रत्याशियों को संभलने से पहले ही चारों खाने चित करवा दिया। कुछ ही किस्मत वाले इस मौन विरोध में अन्य समीकरणों को साध अपनी सीट बचा पाए।

खास बात यह भी सामने निकल कर आ रही है कि जहां सवर्णों को विरोध प्रदर्शन के लिए चेहरा मिला, वहां उसका जमकर समर्थन किया। चुनाव परिणामों को लेकर अधिकारिक रूप से तो बुधवार को पार्टी स्तर पर कोई बड़ी बैठक नहीं हुई, लेकिन दिनभर हारे हुए प्रत्याशी, समर्थक, संगठन पदाधिकारी कारणों की स्व-समीक्षा जरूर करते रहे।

सभी जगह एक ही बात सामने निकलकर आई कि भाजपाई नेतृत्व एट्रोसिटी और प्रमोशन में आरक्षण मामले में जरूरत से ज्यादा जल्दबाजी दिखा गया। अप्रैल उपद्रव के कारण आरक्षित वर्ग भाजपा से दूर हुआ, वहीं एट्रोसिटी एक्ट के अजब-गजब प्रावधानों को सवर्णों ने अपना दमन माना। रही सही कसर, शिवराज सिंह चौहान का 'माई के लाल वाला' बयान पूरी करता रहा।

नेहा किन्नर बड़ा उदाहरण

अम्बाह सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में खड़ी हुईं नेहा को सपाक्स का समर्थन था। सपाक्स समर्थितों (सवर्ण समर्थित) में नेहा ही एक मात्र ऐसी प्रत्याशी थी, जिन्होंने रस्म अदायगी के लिए नामांकन दाखिल नहीं किया था। बिना किसी राजनीतिक अनुभव, बिना किसी दल के परंपरागत वोट बैंक, उन्होंने 29796 वोट हासिल कर लिए। बेशक वे इस चुनाव में 7547 वोट से हारीं, लेकिन उनकी मौजूदगी ने भाजपा प्रत्याशी को तीसरे स्थान पर धकेल दिया।

करैरा में करारी हार का कारण

आरक्षित सीट करैरा में रमेश खटीक पूरे दम-खम से सपाक्स पार्टी के बैनर तले चुनाव मैदान में उतरे। उन्हें 9098 वोट मिले। बेशक उन्हें मिले वोट विजयी हुए कांग्रेसी जसमंत जाटव के आसपास भी नहीं ठहर रहे, लेकिन कहीं न कहीं वह भाजपा की करारी हार का कारण बन गए। यहां भाजपा के राजकुमार खटीक 14824 वोटों से हारे हैं। इस करारी हार के पीछे रमेश खटीक को भाजपा से नाराज सवर्णों का वोट मिलना रहा।

सपाक्सी चेहरा नहीं दे सका

परिणाम आने के बाद से इस बात को लेकर भी समीक्षा चल रही है कि यदि सवर्ण इतने ही नाराज थे तो सपाक्स की अन्य सीटों पर हालत पतली क्यों रही? हकीकत यह रही कि ज्यादतर सवर्णों ने सपाक्सियों को अपना चेहरा नहीं माना। दूसरा यह कि, सपाक्स के अधिकांश प्रत्याशी नामांकन दाखिल करने के बाद से घर बैठ गए थे। उन्होंने लोगों को यह बताने तक जहमत नहीं उठाई कि वे चुनाव मैदान में हैं।

नाराज भाजपाई घर बैठे, कुछ ईवीएम को भर आए पंजे से

शहरी क्षेत्रों में भाजपा को पिछले चुनावों की तुलना में 12 प्रतिशत वोट कम मिला है। वास्तव में यह वो वोट था,जो कहीं न कहीं भाजपा के निर्णयों से खफा होकर या तो घर बैठ गया था या सबक सिखाने के अंदाज में ईवीएम को पंजे से भर आया था। सवर्णों की इस नाराजगी से पूरे ग्वालियर-चंबल अंचल में भाजपा लगभग सफाए जैसी स्थिति में आ गई।

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