- भगवान की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता

ग्वालियर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। बालाजी धाम फूलबाग परिसर में श्रीमद भागवत कथा जारी है। गुरुवार को कथा वाचक कृष्णचंद्र शास्त्री ने कहा कि आप जैसा भोजन करते हैं वैसा ही आपका मन चित्त एवं व्यक्तित्व बनता है। समाज और व्यक्तित्व निर्माण में सात्विक भोजन की महत्वपूर्ण भूमिका है। कश्मीर को ऋषि कश्यप ने बसाया था। आज वहां के मूल निवासी जितने भी पंडित हैं वे ऋषि कश्यप की ही संतान हैं। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को तीन ग्रन्थ अवश्य ही पढ़ना चाहिए। इनमें मनु स्मृति, श्रीमद्भागवत और रामचरितमानस शामिल है। कपिल आख्यान का वर्णन करते हुए कहा, जब माता अदिति ने पूछा कि मृत्यु किसकी होती है। तब भगवान कपिल ने कहा कि मां शरीर की मृत्यु नहीं होती। जो ये समझते हैं कि आत्मा की मुक्ति होती है, वे भी नासमझ हैं। मुक्ति उसकी होती है जिसका बंधन होता है। आत्मा तो स्वयं मुक्त है। जो प्रति पल बदल रहा है वह बदलना ही मृत्यु है। अर्थात जो (परिस्थिति) वर्तमान में नहीं है वह मर चुका है। मुक्ति जीव की होती है, मन की होती है। इसलिए जीवन में फंसे रहने से बेहतर है, ईश्वर की शक्ति को पहचानने की कोशिश करो। महामंडलेश्वर रामदास महाराज, मुख्य यजमान अमरसिंह सिसोदिया, पुष्पा देवी सिसोदिया, उत्कर्ष सिसोदिया ने श्रीमद्भागवत का पूजन कर आरती की। इस मौके पर रमाकांत शास्त्री, महेश नीखरा, श्याम सिंह, प्रभा सिंह, प्रवेंद्र सिंह, सुधा सिंह, डा. आनंद कुमार, गोपाल अग्रवाल, मुकेश गर्ग, रविंद्र गर्ग, राजेश गर्ग, अजय गुप्ता और विनोद गुप्ता आदि उपस्थित थे।

भगवान की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता

पारदी मोहल्ला शिंदे की छावनी में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के पांचवे दिन भागवताचार्य पं. घनश्याम शास्त्री महाराज ने श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण का जन्म देवकी के गर्भ से कारगार में हुआ। वासुदेव ने श्रीकृष्ण को गोकुल में यशोदा के यहां दे दिया। यहां यशोदा ने अपने कान्हा को बड़े ही लाड़ प्यार से पाला। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण बचपन से ही नटखट थे। एक बार श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ यमुना नदी के किनारे गेंद से खेल रहे थे। अचानक गेंद यमुना नदी में चली गई। श्रीकृष्ण को सभी मित्रों ने मिलकर नदी से गेंद लाने के लिए भेज दिया। श्रीकृष्ण भी एकदम से कदंब के पेड़ पर चढ़ कर यमुना नदी में कूद गए। यहां उन्हें कालिया नाग मिला। गोवर्धन लीला का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। इंद्र देव श्रीकृष्ण की लीलाओं से अंजान थे। उन्होंने गुस्से में बहुत तेज बारिश कर दी। गांव वालों को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी एक अंगुली पर उठा लिया और सभी ब्रजवासियों को उसके नीचे शरण दी। सात दिन तक बिना कुछ खाए श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत को उठाए खड़े रहे। इस अवसर पर कथा परीक्षित उमा जीतेंद्र तिवारी, महंत नरेंद्र मिश्रा पप्पी महाराज ने श्रीमद्भागवत की आरती उतारी।

Posted By: anil.tomar

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