- ऐसे बने सफल उद्यमी पहले नौकरी की फिर ईंट के भट्टों से शुरू किया कारोबार, दवा कंपनी का आज 262 करोड़ रुपये है टर्नओवर

जोगेंद्र सेन. ग्वालियर। विभाजन के बाद पाकिस्तान से ग्वालियर आकर बसे परिवार खुद को सफल उद्यमी के रूप में स्थापित करने में सफल हुए हैं। हालांकि सालों गुजरने के बाद खुद की भूमि के छोड़ने का दर्द आज भी उन्हें परेशान कर देता है। इन उद्यमियों में शामिल हैं श्रीराम कालोनी निवासी वयोवृद्ध शिवलाल सीतारानी व बहनोई किशोरीलाल के साथ पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में आने वाले महिदिदाना गांव से 10 अगस्त 1947 को तत्कालीन स्टेट ग्वालियर आए थे। जब वे अपने भाई-बहनों के साथ पाकिस्तान छोड़कर आए थे, तब उनके पास सिर्फ सौ रुपये थे, लेकिन गांधी, जो 75 साल पहले अपने बड़े 5 आज इनका 262 करोड़ का टर्नओवर की आंखें आज भी उन दिनों की स्मृतियों को सुनाकर भर आती हैं। पिता के कहने पर उन्होंने बड़े भाई वहन और बहनोई के साथ अपनी जन्मभूमि को छोड़ा था।

शिवलाल गांधी ने बताया कि उनका गांव नहर के किनारे था। पिता गोविंदराम गांधी की राजस्व विभाग मे नौकरी थी। परिवार में दो भाईव एक बहन है। बहन सीतारानी की शादी किशोरीलालजी सेहो चुकी थी, सुखमय परिवार था। बड़े भाई इंजीनियर थे, मैंने मैट्रिक पास कर ली थी। पाकिस्तान में आजादी से एक साल से पहले ही विभाजन की स्थिति बनने लगी थी। हिंदू इस विभाजन के पक्ष में नहीं थे। आजादी के 15 दिन पहले से हालात बिगड़ने लगे थे, लेकिन यह सपने में भी नहीं सोचा था कि हमें आपनी मातृभूमि छोड़कर जाना पड़ेगा। 10 अगस्त को फिल्म देखकर लौटने पर पता चला कि मार काट शुरू हो गई है। पिता ने हम दोनों भाइयों, वहन व वहनाई को 100-100 रुपये देकर ग्वालियर रियासत क लिए आने वाली ट्रेन में बैठा दिया। उन्होंने ग्वालियर रियासत को इसलिए चुना, क्योंकि यह हिंदू राज्य था। भाई स्वर्गीय शांतिलाल गांधी, बहन है। 92 वर्षीय शिवलाल गांधी

नया सफर दतिया के भांडेर से शुरू किया

उन्होंने बताया कि जीवन का नया सफर दतिया जिले के भांडेर से शुरू हुआ। हमें यहां ऐसे स्थान की तलाश थी, जहां सब सस्ता हो। इसी खोज में हम भांडेर आगए। उस समय पांच रुपये एक क्विटल गेह और एक रुपये किलो शुद्ध घी मिलता था। भांडेर में चक्की नहीं थी तो वहन ने हाथों से गेहूं पीसना शुरूकर दिया। बमुश्किल हन के परिवार और हम दो भाइयों का गुजरा हो पाता था। एक समय रोटी और एक टाइम भुने हुए चने खाते थे। इस बीच पिता भी. किसी तरीके से हिंदुस्तान आ गए। हम दिल्ली जिससे वह हम तक पहुंच गए। कुछ दिन पिताजी भी जैसे-तैसे यहां आ गए, जो हमें हालात ठीक न होने के कारण ग्वालियर ले आए। ग्वालियर मैं मैंने जीवाजी इंडस्ट्रियल रिसर्च सेंटर में लैब तकनीशियन की नौकरी कर की बड़े भाई की नौकरी शिवपुरी की आयल मिल लग गई। हालांकि परेशानी अब भी कम नहीं हुई। मेरी शिक्षा उर्दू व फारसी में हुई थी और यहां काम हिंदी में होता था, इसलिए हिंदी सीखनी पड़ी। मैने लैब तकनीशियन की नौकरी छोड़कर खाद्य विभाग में क्लर्क की नौकरी ज्वाइन की। इसके वाद शासकीय ग्वालियर इंजीनियर वर्स में जनरल मैनेजर की नौकरी मिल गई। इसी बीच मेरी तरह पकिस्तान के मुलतान से आई सुशीला से शादी हो गई। एक बेटा सुनील गांधी व दो वेटी मीरा व मल्लिका का जन्म हुआ। नौकरी छोड़कर दर्जन ईंट भट्टे शुरू किए। बाद में ग्वालियर में वेल्डिंग राड बनाने का प्लांट शुरू किया, जो आज भी है। साथ ही बेटे सुनील व पौत्र ध्रुवगांधी ने दवा बनाने की फैक्ट्री शुरू की है। अब कुल सालाना कारोबर 262 करोड़ का है। शिवलाल का कहना है कि करोड़ों हिंदुओं की तरह उनका सपना भी अखंड भारत का है। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को और समय मिला तो यह सपना पूरा हो सकता है, क्योंकि मोदी ने विश्व को भारत की ताकत का पहसास कराया है। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 समाप्त करना उनकी सबसे बड़ी सफलता है।

Posted By: anil tomar

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