नईदुनिया ग्वालियर के संपादकीय प्रभारी वीरेंद्र तिवारी का रविवारीय काॅलम: वीर-बोल

सियासी लड़ाई में 'कठपुतली' अफसर

सरकार बिगड़ती है तो अफसरों के आगे बड़ी विचित्र स्थिति बन जाती है। पहले जिनके खिलाफ कार्रवाई कर रहे थे अब वह हुक्म देने की स्थिति में आ जाते हैं । और जो सबकुछ थे उन पर माफिया समझकर डंडा चलाया जाने लगता है। पिछले एक साल से प्रदेश में सर्वाधिक यह ग्वालियर में देखने को मिल रहा है। यहां कमल नाथ सरकार ने एंटी माफिया कार्रवाई करवाई । अब फिजा बदल गई है तो अफसर फीता-जेसीबी लेकर फिर निकल पड़े हैं। रातों रात वैध अवैध के पैमाने बदल गये। हालांकि इस बार मामला थोड़ा टेढ़ा है। भले ही पूरे प्रदेश में भाजपा बहुमत में हो लेकिन ग्वालियर में छह में से चार सीटों पर कांग्रेस के विधायक हैं। इसलिए प्रशासन की क्रिया की प्रतिक्रिया भी तगड़ी हो रही है। अब संतुलन बिठाने के लिए पहचाने जाने वाले अफसर के 'कौशल' की परीक्षा है।

हाथ मुट्ठी कब बनेगा

कोई चराग़ जलाता नहीं सलीक़े से मगर सभी को शिकायत हवा से होती है.. ख़ुर्शीद तलब का यह शेर शायद कांग्रेस के लिए ही लिखा गया होगा। उपचुनाव में पार्टी कैसे बेमन से लड़ी सभी को पता है। उसमें भी ग्वालियर चंबल अंचल में इतना उम्दा कर गई कि भाजपा की जीत फीकी लगने लगी। अब नगरीय निकाय चुनाव सिर पर हैं और कांग्रेस वैसी ही बिखरी बिखरी लग रही है जैसे हमेशा से लगती रही है। न तो हार की ही समीक्षा हो रही है न ही प्रदेश में नेतृत्व के अते पते हैं। ग्वालियर में जरूर प्रवीण पाठक जैसे युवा विधायक सिंधिया विरोध से नीचे के कार्यकर्ताओं में जान फूंकने में लगे हैं । लेकिन उनका हाथ को मुट्ठी बनाने का यह 'गिलहरी' प्रयास कितना सफल होगा यह भी प्रदेश के उन्ही नेताओं पर निर्भर करेगा जो कांग्रेस को यहां तक ले आए हैं।

चुनाव ही असली कोरोना वैक्सीन

दुनिया फालतू में कोरोना वैक्सीन पर मेहनत कर रही है। प्रदेश के अफसरों और नेताओं से सीखो कि कोरोना से कैसे निपटते हैं। अरे डब्ल्यूएचओ को केस स्टडी करना चाहिए भाई। अब देखो न अंचल में उपचुनाव संपन्न क्या हुए अचानक से कोरोना के केस बढ़ गये हैं। जिस कोरोना को अफसरों ने दर्जन में समेट दिया था उसने फिर शतक जमाना शुरू कर दिया है। कम सैंपलिंग का आरोप न लगे इसलिए ऐसा गणित फिट किया कि पाजिटिव मरीज निकलें ही नहीं। जिन नेता-अफसरों ने चुनाव में कोविड गाइड लाइंस की धज्जियां उड़ाई वही दोनों अब मिलकर फिर से कोरोना से बचने का ज्ञान देने लगे हैं, लाकडाउन पर मंथन करने लगे। मैं तो कहता हूं वैक्सीन लाकडाउन छोड़ो और तुरंत निकाय चुनाव की घोषणा करवाओ फिर देखो नेता अफसरों की जोड़ी मिलकर कैसे रातों-रात कोरोना को शहर-प्रदेश से 'गायब' कर देती है।

'चांद' पर' बना दीं सौगातें

शहर में स्मार्ट सिटी के कुछ उम्दा प्रोजेक्ट महाराज बाड़े पर आकार ले रहे हैं। जैसे डिजिटल म्यूजियम, प्लेटोनियम, टाउन हाल। पिछले दिनों डिजिटल म्यूजियम देखने का मन हुआ। दोपहर दो बजे निकला। राक्सी टाकीज रोड पर ऐसा भीषण जाम लगा कि मुझे महज कुछ सौ मीटर की दूरी तय करने में घंटों लगे। लौटते में सराफा रोड पर भी यही हाल हुआ। रेंगते रेंगते शाम छह बजे तक जैसे तैसे घर पहुंच सका। क्या इन प्रोजेक्ट्स को कागजों पर बनाते हुए अफसरों ने एक बार भी वहां आसान पहुंच योजना पर विचार किया? लोग कहते हैं कि महाराज बाड़ा पहुंचना दिनों-दिन चांद पर पहुंचने जितना कठिन होता जा रहा है। स्मार्ट सिटी के जिम्मेदारों की दलील है कि बाड़े चौक को नो व्हीकल जोन किया जाना प्रस्तावित है लेकिन उस नो व्हीकल चौक तक भी तो पर्यटक व्हीकल से ही जाएगा ना ।

Posted By: vikash.pandey

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