वीरेंद्र तिवारी, संपादकीय प्रभारी नईदुनिया ग्वालियर

यह चुनाव भी न कितनी अजीब चीज होती है। माननीय जिन काम के लिए चुने जाने के लिए जनता के बीच जाते हैं उन्हीं कामों की बात नहीं करते। जनता सड़क की बात करती है तो नेताजी सामने वाले प्रत्याशी को सड़कछाप कहते है। जनता अपराध, मिलावट, खनन पर लगाम कैसे लगेगी पर माननीय के विचार सुनना चाहती है तो नेताजी भूखा नंगे, गद्दार जैसे शब्द पर ही बहस करते रहते हैं। कभी कभी तो लगता है चुनाव न हो बिगबास का शो चल रहा है। काम की एक बात नहीं। बेचारी जनता सभाओं को सुनते हुए हर दिन नेताओं को कोसती रहती है। कितना अच्छा होता यदि हर विधानसभा में प्रमुख प्रत्याशी जनता के मुद्दों पर आमने-सामने बहस करते। पिछले बार पार्टी के वचन पत्र की आडिट रिपोर्ट पेश करते। अभी तो चल ये रहा है कि न आप तान छेड़ना न हम तबला बजाएंगे।

बिगड़ी व्यवस्था पर मीलार्ड का सहारा

कई बार तो लगता है कि कोर्ट नहीं होती तो क्या होता। प्रशासन- पुलिस नेताओं के आगे पंगु हो जाते हैं तब कोर्ट ही उन्हें आइना दिखाता है। अब कोरोना को ही देख लो। जब एक केस भी शहर में नहीं था तब आम जनता को मवेशियों की तरह पीटा गया। दो ग्राहक भी खड़े हुए तो दुकानदारों पर जमकर पुलिसया कहर बरपा। शहर में ही करीब आधा करोड़ रुपये के चालान काट दिए गये। लेकिन चुनाव क्या आए सारे नियमकानून ताक पर रख दिए गये। हजारों की भीड़ फिर भी कोई कार्रवाई नहीं। भला हो हाईकोर्ट का। मीलार्ड ने आमजनता की जान से खिलवाड़ कर रहे इन नेताओं पर लगाम कसने के लिए केस दर्ज करवा दिया। लेकिन पुलिस और प्रशासन ने उसमें भी खेल कर दिया। याचिकाकर्ता के आवेदन में कानून तोड़ने वाले गुरुओं का नाम था,केस दर्ज हुआ चेलों पर।

'आवक’ का संतुलन और जहरीली शराब

यह किसी से छिपा नहीं है कि अवैध शराब का धंधे की लाबी शराब ठेकोदारों से अधिक मजबूत होती है। अधिकृत शराब कांट्रेक्टर सिस्टम से सेटिंग इसलिए नहीं करता कि उसे शराब बेचनी है बल्कि इसलिए करता है कि उनके एरिया में कच्ची-अवैध शराब न बिकने दी जाए जिससे मदिरा प्रेमी दुकान तक शराब लेने आएं। लेकिन वह सिस्टम ही क्या जो 'आवक’ का संतुलन न बना सके। इसी संतुलन के कारण उज्जैन में कच्ची शराब के नाम पर जहर परोसा गया। 14 वह मजदूर काल के गाल में समा गये जो दुकान से अपेक्षाकृत महंगी शराब खरीदकर 'अर्थव्यवस्था' को मजबूत नहीं कर पा रहे थे। अब पुलिस औऱ आबकारी के चंद पियादों को हटा दिया गया है। कुछ दिन बाद मामला रफा दफा हो जाएगा। सिर्फ कुर्सी पर चेहरा बदल गया है सिस्टम नहीं। फिर नशीला जहर धडल्ले से बिकेगा। 'संतुलन' बना रहेगा।

शिवराज सुधार रहे गलती

है कोई माय का लाल ..शिवराज सिंह चौहान को यह बयान ताउम्र याद रहेगा। पिछले दो साल ही सरकार बनाने बचाने की जितनी भी कसरत भाजपा द्वारा की जा रही है उसमें इस बयान का अहम रोल है। 2018 में इस एक वाक्य ने ग्वालियर चंबल अंचल में ऐसा करंट फूंका था कि भाजपा के गढ़ में ही पार्टी परास्त हो गई। अब शिवराज सिंह चौहान अपनी गलती सुधार रहे हैं। बरैया के दलित समुदाए पर दिए गये बयान पर खुले तौर पर शिवराज सिंह चौहान ने मुखालफत की। इतना ही नहीं हालही में अंचल के सवर्ण नेताओं को सीएम हाउस में डिनर डिप्लोमेसी के तहत मनाने की कोशिश की। शिवराज की हर कोशिश है कि उनकी सवर्ण विरोधी छवि से वह बाहर आ जाएं। पार्टी का भी दवाब है कि परंपरागत वोट बैंक से साथ कोई छेड़छाड़ कर अपने पैर पर कुल्हाड़ी न मारें।

Posted By: Prashant Pandey

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