Taste of Haridwar Dum Aloo: ग्वालियर. नईदुनिया प्रतिनिधि। मेला की साफ सफाई होने के साथ ही टीन, तख्त, पटिया, लकड़ी आदि किराए से देने वालों की दुकानें सजने लगी हैं। मेला के आकर्षण का केन्द्र रहने वाला हरिद्वार वाला रेस्टोरेंट 14 दिसंबर से शुरू हो जाएगा। 30 नवंबर को हरिद्वार वाले का सामान आना शुरू होगा। जिसके बाद 13 दिन में पूरा रेस्टोरेंट तैयार हो जाएगा। रेस्टोरेंट संचालक मिंटू अग्रवाल का कहना है कि पूरी टीम इस वक्त मेरठ में आ चुकी है। जो 30 नवंबर को ग्वालियर मेला पहुंचेगी। जहां पर 14 दिसंबर से लोगों को दम आलू और गाजर के हलवा का स्वाद देने के लिए रेस्टोरेंट खुल जाएगा। मेला प्राधिकरण ने परिसर की साफ सफाई और मरम्मत का काम शुरू करा दिया है।

हालांकि संभागायुक्त ने परिसर की सफाई और दुकानों की मरम्मत के लिए नगर निगम और पीडब्ल्यूडी को निर्देश दिए थे। लेकिन नगर निगम ने मेला अवधि तक साफ सफाई के लिए प्राधिकरण को 1 करोड़ 19 लाख का प्रस्ताव भेज दिया जबकि पीडब्ल्यूडी ने दुकान व सड़क की मरम्मत के लिए साढ़े 3 करोड़ का प्रस्ताव बनाकर थमा दिया। यह देख मेला प्राधिकरण ने खुद ही सफाई और मरम्मत कराने की जिम्मेदारी उठाने का निर्णय ले लिया। आटो मोबाइल सेक्टर जहां पर लगता है उसके पीछे की गोलाकार आकार में स्टेडियम की नींव रखी गई थी। चारों ओर पिलर व दीवारें भी तैयार हुई, अंदर सैलानियों को बैठने के लिए स्टेडियम का आकार देते हुए कुर्सी भी बनाई गई। स्टेडियम के चारों ओर आवगमन के लिए दरवाजे दिए गए थे। स्टेडियम का लगभग काम पूरा था। केवल पिलर पर छत डलना शेष था। यदि छत का काम हो जाता तो उसमें बाहर की ओर दुकानें निकाली जानी थीं। जिससे मेला की आय बढ़ने के साथ भव्यता भी बढ़ती।

गौरतलब है कि ग्वालियर व्यापार मेला की भव्यता को बढ़ाने के लिए बनाया जा रहा दंगल स्टेडिम आधा आधूरा पड़ा हुआ है। पिछले दस साल में स्टेडियम के अधूरे निर्माण को पूरा करने की दिशा में मेला प्राधिकरण ने मुड़कर भी नहीं देखा। कारण खुद मेला प्राधिकरण के अफसरों काे नहीं पता। दस साल पहले 2012-13 में मेला प्राधिकरण की बैठक में दंगल स्टेडियम बनाने का निर्णय लिया गया था। तत्कालीन मेला अध्यक्ष अनुराग बंसल ने इसके लिए 35 लाख रुपये का फंड भी जारी किया था। दंगल स्टेडियम के निर्माण का कार्य भी शुरू हुआ। स्टेडियम पूरा होता उससे पहले 2014 में मेला कार्यकारणी भंग हो गई और अनुराग बंसल को अध्यक्ष की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। लेकिन इसका असर मेला की भव्यता में चार चांद लगाने जा रहे स्टेडिम पर पड़ा और उसका काम भी बीच में ही बंद कर दिया गया। तब से लेकर अबतक स्टेडियम अधूरा पड़ा हुआ है और मेला खुले आसमान के नीचे हो रहा है। स्टेडियम का कार्य पूरा न करने के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि दंगल में पहलवान अब गद्दे पर कुश्ती करते हैं। जबकि स्टेडियम में गद्दे व जमीन पर कुश्ती कराने की सुविधा रखी गई थी। जिससे ग्रामीण क्षेत्र से आने वाले पहलवान और मेट्रो सिटी में ताल ठोकने वाले पहलवान एक ही स्टेडियम में दाव आजमा सकें।

Posted By: anil tomar

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