ग्वालियर, नईदुनिया प्रतिनिधि। सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को उस एसएलपी पर सुनवाई हुई, जिसमें राज्य शासन ने नगरीय निकाय के अध्यक्ष पद के आरक्षण के स्टे को चुनौती दी है। इस मामले में 10 दिसंबर को फिर से सुनवाई होगी। याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा उपस्थित होने वाले हैं। राज्य शासन ने एसएलपी में तर्क दिया है कि संविधान के अनुच्छेद 243 टी के क्लाज चार में रोटेशन की व्यवस्था नहीं की गई है। याचिकाकर्ताओं ने गलत तथ्य देकर हाई कोर्ट से स्थगन प्राप्त किया है।

हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में नगर निगम के महापौर, नगर पालिका अध्यक्ष व नगर पंचायत अध्यक्षों के आरक्षण को चुनौती देने के लिए अलग-अलग नौ जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं। युगलपीठ में सभी जनहित याचिकाओं को एक साथ सुना जा रहा है। कोर्ट ने 12 मार्च 2021 को अंतरिम आदेश पारित करते हुए दो नगर निगम, 79 नगर पालिका, नगर पंचायत के आरक्षण की प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी। अब ये याचिकाएं जबलपुर की प्रिसिंपल बेंच में स्थानांतरित हो गई हैं। शासन ने कोर्ट के समक्ष तर्क दिया था कि सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर दी है। हाई कोर्ट ने रोक बरकरार रखते हुए याचिकाओं की तारीख बढ़ा दी। राज्य शासन की एसएलपी पर एक बार सुनवाई हो चुकी है। याचिकाकर्ता रवि शंकर बंसल व मनवर्धन सिंह तोमर को नोटिस जारी हो चुके हैं। इस मामले में सोमवार को रवि शंकर बंसल व मनवर्धन सिंह तोमर को सुप्रीम कोर्ट में जवाब देना था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में रवि शंकर बंसल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा पैरवी करने वाले हैं। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में उनके जूनियर ने वकालत नामा पेश कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट में यह दिए हैं तर्कः

-राज्य शासन ने अपनी एसएलपी में तर्क दिया है कि नगर पालिका अधिनियम 1999 के नियम छह में रोटेशन की प्रक्रिया निर्धारित की है, लेकिन हाई कोर्ट ने नियम छह के पूरे नियमों को नहीं पढ़ा है।

-संविधान के अनुच्छेद 243 टी के क्लाज पांच में राज्य विधायका को शक्तियां दी गई हैं। इस नियम के तहत अपने विवेक से कार्य कर सकते हैं।

-आबादी के आधार पर पदों को आरक्षित किया जाता है।

Posted By: vikash.pandey

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close