ग्वालियर. नईदुनिया प्रतिनिधि। छेड़छाड़ के मामले में पीड़िता आरोपों से मुकर गई। हाई कोर्ट की एकलपीठ ने उस मुआवजे की एक लाख की राशि को वापस लेने के निर्देश दिए हैं, जो शासन से मिले थे। जब कोई अपराध ही नहीं हुआ है तो पीड़िता मुआवजे की हकदार नहीं है। ट्रायल कोर्ट इस बात पर विचार करे कि फैसला सुनाते वक्त पीड़िता पर अभियोजन चलाया जा सकता है या नहीं। साथ ही पंजाब नेशनल बैंक को आदेश दिया है कि यदि खाते में पैसे हैं, तो उसे निकालने नहीं दिया जाए।

भिंड जिले के सिटी कोतवाली थाने में एक युवती ने छेड़छाड़ व एट्रोसिटी एक्ट के तहत केस दर्ज कराया था। मोहम्मद वारिश पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। युवती का आरोप था कि राह चलते उसने अश्लील हरकत की थी। केस दर्ज होने के बाद पुलिस ने 27 मई 2021 को उसे गिरफ्तार कर लिया। जिला कोर्ट से जमानत आवेदन खारिज होने के बाद हाई कोर्ट में पहली जमानत याचिका दायर की, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। पीड़िता के बयान दर्ज होने के बाद आरोपित ने दूसरी जमानत याचिका दायर की। उसकी ओर से तर्क दिया गया कि पीड़िता ने कोर्ट में जो बयान दिए हैं, बयानों में आरोपों की पुष्टी नहीं की है। वह बयानों से पलट गई है। इसलिए जमानत पर रिहा किया जाए। कोर्ट ने आरोपित को जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने शासन से पूछा था कि पीड़िता को कोई मुआवजा तो नहीं दिया है। शासन से जानकारी आई कि जून 2021 में मुआवजे की आधी राशि पंजाब नेशनल बैंक के खाते में ट्रांसफर की थी। उसे एक लाख रुपये मुआवजा दिया गया था। कोर्ट ने मुआवजे की इस राशि को वसूल करने के निर्देश दिए हैं। यह कार्रवाई 20 दिन में कर हाई कोर्ट के प्रिंसिपल रजिस्ट्रार के यहां रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। ज्ञात हो कि अनुसूचित जाति व जनजाति की महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के बदले में मुआवज दिया जाता है। यह प्रविधान 1989 में बनाया गया था। मुआवजे की राशि पांच लाख रुपये तक रहती है। अपराध की गंभीरता के आधार पर मुआवजा मिलता है।

Posted By: anil.tomar

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