ग्वालियर, अजय उपाध्याय। देश की सेवा के लिए जरूरी नहीं है कि आप सीमा पर ही जाएं। आप जहां हैं और जिस स्थिति में हैं, वहां भी आप यह काम कर सकते हैं। ग्वालियर निवासी डॉ. विक्रम सिंह की प्रेरक कहानी सामने है। बावजूद इसके कि खुद हाथ-पैर से लाचार हैं, लेकिन चिकित्सा को देश सेवा का माध्यम और गरीबों की सेवा को अपना धर्म मानते हैं। डॉ. विक्रम बीते छह साल से ग्वालियर के सिविल अस्पताल की दो डिस्पेंसरियों को बखूब संभाल रहे हैं।

डॉ. विक्रम सिंह के पिता केके सिंह आर्मी में कैप्टन थे और वही उनके प्रेरणास्रोत भी हैं। दोनों पैरों ने 10वीं की पढ़ाई के दौरान ही काम करना बंद कर दिया था। बैसाखी के सहारे एमबीबीएस की पढ़ाई की। बाद में हाथों ने भी साथ छोड़ दिया। अब वे चल फिर नहीं सकते, लेकिन सेवा का जज्बा ऐसा, मानो कोई सैनिक मोर्चे पर तैनात हो। 36 वर्षीय डॉ. विक्रम की कार ही उनकी चलती-फिरती डिस्पेंसरी है। कार को देखते ही मरीज उन्हें घेर लेते हैं और वह कार में बैठे-बैठे मरीजों का इलाज करते हैं। इसके लिए कोई फीस नहीं लेते। जरूरत पड़ने पर मरीजों की दवा का खर्च भी उठाते हैं।

डॉ. विक्रम सुबह से लेकर शाम तक हेमसिंह की परेड स्थित सिविल हॉस्पिटल के बाहर गाड़ी में बैठे-बैठे ही मरीजों का इलाज करते हैं। शाम के बाद वह घर पर या किसी बस्ती वगैरह में जरूरतमंद मरीजों का नि:शुल्क इलाज करते हैं।

यही मेरी देश सेवा है...

डॉ. विक्रम सिंह ने कहते हैं, 'इरादे पक्के होने चाहिए, देश की सेवा कहीं पर भी और किसी भी हाल में की जा सकती है। जब शरीर ने काम करना बंद कर दिया तो मेरे दिल और दिमाग ने अधिक काम करना शुरू कर दिया। किसी को लाचार और बेबस नहीं देख सकता। इसलिए हर जगह इलाज करना शुरू कर देता हूं। यही मेरी देश सेवा है।"