World Family Day: चेतना राठाैर, ग्वालियर नईदुनिया। परिवार शब्द में ही एकता झलकती है, लेकिन वर्तमान में लोग परिवार का अर्थ ही भूल गए थे। अपनी सहूलियत और जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर लोगों ने छोटे परिवार का रास्ता अपना लिया था। परिवार में पति-पत्नी और दो या एक बच्चे को ही सीमित कर लिया था। लोगों का मानना है कि शादी के बाद बेटे संयुक्त परिवार में रहना पसंद नहीं करते, इसलिए वे एक ही शहर में अपनी सहूलियत को देखते हुए अलग रहते हैं, लेकिन जब परिवार के अपनों पर मुसीबतों का पहाड़ टूटता है तो ये परिवार एकता का संदेश देते हुए एकजुट हो जाते हैं। आज विश्व परिवार दिवस पर हम आपको न्यूक्लियर फैमिली से ज्वाइंट फैमिली होने तक का सफर और उसके फायदे गिनाएंगे। कोरोनाकाल में शहर का ऐसा कोई परिवार नहीं है, जो इसके प्रभाव से बचा हो। किसी के पिता तो किसी की मां व भाई-बहन, बेटा-बेटी आदि इसके शिकार हुए हैं, लेकिन जब कोरोना से लड़ने की बारी आई तो सब एकजुट होकर कोरोना से जंग लड़कर विजयी हुए और अपनों की जिंदगी बचा ली।

मां की बिगड़ी हालत ने दो भाइयों को मिलायाः मुरार निवासी कुलदीप ने बताया कि वे एक घर में रहने के बाद भी अलग-अलग रहते हैं। हम दो भाई होने के बाद भी माता-पिता को खाना कौन देगा, इसी झगड़े में हम उन्हें खाना तक नहीं देते थे। ऐसे वह खाना स्वयं बनाकर खाते थे, लेकिन जब मेरी मां की अचानक तबीयत खराब हुई तो लगा जैसे मां का साया हमारे सिर से उठ जाएगा। पहले हम दोनों भाई एक-दूसरे को देखना पसंद नहीं करते थे, लेकिन मां की हालत देखकर आज हम दोनों हिम्मत से उनकी देखभाल कर रहे हैं। यह देखकर मेरी मां कोरोना से जल्द ठीक हो गईं। आज हमें पता चला कि एकता और संयुक्त परिवार की ताकत क्या होती है।

हम पांच भाइयों ने किया कोरोना का सामनाः एसएम नावेद ने बताया कि हम पांच भाई हैं, लेकिन नौकरी और व्यापार की वजह से सभी अलग-अलग रहते हैं। एक दिन मेरे भाई की तबियत अचानक से खराब हो गई। जांच कराने पर उन्हें कोरोना निकला, लेकिन काफी इलाज कराने के बाद भी हम उन्हें बचा नहीं सके। हमने अपने माता-पिता से संयुक्त परिवार की एकता की कहानियां सुनी थीं। आज मेरी भाभी अस्पताल में हैं, उन्हें बचाने के लिए हम सभी एक होकर उनका इलाज करा रहे हैं। हम सभी दूर रहते हैं। माह में एक दो बार ही मिल पाते थे, लेकिन इन दिनों हम भाइयों की एकता ने हमें परेशानियों से लड़ना सिखा दिया है।

माता-पिता की आज्ञा मान, आ गए एक छत के नीचेः बसंत विहार निवासी पीएम पारख ने बताया कि मेरे परिवार के लोग अलग-अलग शहरों में रहते थे। सभी व्यापार व नौकरी के पेशे से जुड़े हुए हैं। हमारे परिवार मेें कुल 11 लोग हैं, जो कभी भी एक समय पर नहीं मिल पाते थे, लेकिन इस कोरोनाकाल में हम सभी लोग एक ही घर में रहने के लिए आ गए हैं। हमारे माता-पिता को डर था कि ऐसे महौल में जब दुनिया आपदा से जूझ रही है। ऐसे में सभी को एक साथ रहना चाहिए। हालांकि मन-मिटाव तो रहते ही हैं, लेकिन इन दिनों सभी साथ रहकर मन-मिटाव को दूर कर साथ में समय व्यतीत कर रहे हैं ।

Posted By: vikash.pandey

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