खिरकिया। नवदुनिया न्यूज

जैन धर्म के प्रमुख पर्वो में से एक अष्टान्हिका पर्व आज बुधवार से शुरू हो रहा है। आठ दिन मनाया जाने वाला अष्टान्हिका पर्व जैन धर्म में विशेष स्थान रखता है। आठ दिन का यह उत्सव, साल में तीन बार मनाया जाता है। इस अवधि में जैन मत को मानने वाले रोज मंदिरों में विशेष पूजा, सिद्धचक्र मंडल विधान, नंदीश्वर विधान और मंडल पूजा सहित कई प्रकार के अनुष्ठान करते हैं। अष्टमी से पूर्णिमा तक मनाया जाने वाला यह पर्व इस बार 06 जुलाई से 13 जुलाई तक चलेगा। भगवान महावीर स्वामी को समर्पित उत्सव जैन धर्म के सबसे पुराने पर्वों में से एक है। ये साल में तीन बार कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ के महीनों में मनाया जाता है। 06 जुलाई से शुरू हो रहा ये आषाढ़ मास का अष्टान्हिका उत्सव है।

दिगंबर जैन महिला मंडल की अध्यक्ष मंजू जैन ने बताया कि अष्टान्हिका पर्व की शुरुआत मैना सुंदरी द्वारा अपने पति श्रीपाल के कुष्ठ रोग निवारण के लिए किए गए प्रयासों से हुई थी। पति को निरोग करने के लिए उन्होंने आठ दिनों तक सिद्धचक्र विधान मंडल और तीर्थंकरों के अभिषेक जल के छीटें देने तक साधना की थी। इसका जैन ग्रथों में भी उल्लेख मिलता है। तभी से आठ दिनों में जैन धर्म का पालन करने वाले, ध्यान और आत्मा की शुद्धि के लिए कठिन तप व व्रत आदि करते हैं।

अष्टान्हिका पर्व का महत्व

महिला मंडल उपाध्यक्ष सुरेखा सेठी ने बताया कि वर्ष में तीन बार आने वाले अष्टान्हिका पर्व के बारे में जैन मतावलंबियों की मान्यता है, कि इस दौरान स्वर्ग से देवता आकर नंदीश्वर द्वीप में निरंतर आठ दिन तक धर्म कार्य करते हैं। कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ इन तीन महीनों के शुक्ल पक्ष में मनाये जाने इस पर्व पर जो भक्त नंदीश्वर द्वीप तक नहीं पहुंच सकते वे अपने निकट के मंदिरों में पूजा आदि कर लेते हैं। ये विधान हिंदी तिथि के अनुसार किया जाता है यानि, यदि तिथियां घट बढ़ जाती है तो सप्तमी अथवा नवमी से पर्व मनाया जाता है।

आज से मंदिर में होगा सिद्धचक्र विधान

अष्टान्हिका पर्व के पर 6 जुलाई से कालेज रोड स्थित दिगंबर जैन मंदिर में सिद्धचक्र विधान शुरू होगा।दिगंबर जैन महिला मंडल की पूर्व अध्यक्ष मधु जैन ने बताया कि सिद्धों की विशेष आराधना के लिए सिद्धचक्र महामंडल विधान किया जाता है। यह ऐसा अनुष्ठान है, जो हमारे जीवन के समस्त पाप, ताप और संताप नष्ट करता है। सिद्ध शब्द का अर्थ है कृत्य-कृत्य, चक्र का अर्थ है। समूह और मंडल का अर्थ एक प्रकार के वृत्ताकार यंत्र से है। इनको मिलाकर ही सिद्धचक्र बनता है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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