खिरकिया। नवदुनिया न्यूज

पर के ऊपर उपकार अनंत बार करो, लेकिन एक बार स्वयं पर उपकार करोगे तो बेड़ा पार होगा। दूसरों पर उपकार करने पर स्वर्ग मिलता है। स्वयं पर उपकार करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। व्यसन करने वाले मित्रों से सदा दूर रहना चाहिए। चाहे वह कितने ही अच्छे हों। माता-पिता से बड़ा भगवान व गुरु भी नहीं होता। घर में भाई बहन परिवार के लोग भूखे बैठे हो और बाहर अन्नादान व भंडारे करने पर धर्म नहीं होगा। यह बात दिगंबर जैनसंत मुनि उत्तमसागर महाराज ने गुरुवार को समाज के मंदिर में अपने प्रवचन में कही। उन्होंने कहा कि आत्मा को बाद में, पहले स्वयं को समझो। घर में बना भोजन ही करना चाहिए, बाहर होटल व ढाबे पर कभी भी भोजन नहीं करना चाहिए।

मुनिश्री ने आगे कहा कि आज का प्राणी संसार में सुगंध के पीछे घूम रहा है। हिरण खुशबू के पीछे घूमता है, जो उसकी नाभि में ही होती है। गुरू व भगवान के प्रति पूज्य भाव रखना है, ह्रदय उपासना मन सद्भावना व शरीर साधना मे व्यस्त रहना चाहिए। ऐसे मित्र बनाए जो कल्याण की सोचते हो, दुख और बीमारी में क्षमता भाव रखना चाहिए। क्रोध किसी को देखता नही, क्रोध से भय, अंधकार, घंमड, उपेक्षा द्वेष होता है। महाराजजी ने कहा कि अपनी कामनाएं कम रखो, इच्छा ज्यादा होगी तो समस्याएं भी आएंगी। और यदि इच्छाएं पूरी नहीं हुई तो क्रोध आएगा और काम बिगड़ जाएंगे।

उन्होंने कहा कि बिना प्रचार के दान देने से इच्छापूर्ति होती है। दान करने के बाद यह भाव नहीं आए की मैंने इतना दान दिया है, ऐसा करने से दान का पुण्य कम हो जाता है। संसार में परोपकार व कल्याण की भावना रखें तो सुखी जीवन रहेगा। सुखी बनने के लिए स्वयं के साथ दूसरों के कल्याण की भावना रखें। सत्संग ही जीवन में साथ देगा, संत समागम ही पाप से बचाएगा, महाराज श्री ने कहा धर्म ध्यान करना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि छोटे दान करने से भी बड़ा पुण्य प्राप्त होता है। इससे पहले गुरुवार सुबह मुनि उत्तमसागरजी, मुनि कुंथुसागरजी एवं मुनिपुराण सागर महाराज का खिरकिया आगमन हुआ। मुनियों की आहारचर्या पूनमचंद जैन, विजय सेठी एवं के निवास पर हुई, जहां श्रावक-श्राविकाओं ने मुनियों को निर्दोष आहार दिया।

Posted By: Nai Dunia News Network

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