अतुल तिवारी, हरदा। आदिवासी जनजाति के बच्चे पढ़ाई कर सकें, इसके लिए शासकीय प्राथमिक शाला उमरी में पदस्थ शिक्षक राकेश सोलंकी पिछले 16 वर्षों से स्कूल में स्टेशनरी बैंक चला रहे हैं। गरीब आदिवासी बच्चे जो पढ़ना तो चाहते हैं, लेकिन उनके पास किताब, पेन्सिल, स्लेट खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। ऐसे बच्चों को सरकारी स्कूल में ही स्टेशनरी बैंक के माध्यम से नि:शुल्क शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराई जाती है, ताकि उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो।

इतना ही नहीं आदिवासी जनजाति के बच्चे यदि स्कूल नहाकर नहीं आते थे तो शिक्षक स्वयं उन्हें नहलाना शुरू कर देते थे। उनके कपड़े भी धोए और उनमें नहाकर स्कूल आने की आदत डाली। कुछ गरीब आदिवासी बच्चों के पास चप्पल भी पहनने के लिए नहीं होती है। इससे धूप में स्कूल आने में उनके पैर जलते हैं और बच्चे गर्मियों में स्कूल आना कम कर देते हैं। ऐसे बच्चों को शिक्षक राकेश स्वयं चप्पल खरीद कर बांटते हैं। पिछले 10 साल से हर वर्ष मार्च-अप्रैल में वे स्कूल के दर्जनों बच्चों को चप्पलें खरीद कर देते हैं।

1995 से की शुरुआत

शिक्षक राकेश सोलंकी ने बताया कि 1995 में उनकी पोस्टिंग शासकीय प्राथमिक शाला जामूगो में हुई। बच्चे नहा कर नहीं आते थे तो उन्हें नहलाना शुरू किया व कपड़े धोए। 1998 तक वे वहीं रहे तो बच्चों को साफ-सफाई से रहना सिखाते रहे। 1998 से 2003 तक जमनाखुर्द पंचायत स्थित प्राथमिक शाला में पदस्थ रहे। 2003 में शासकीय प्राथमिक शाला उमरी में पदस्थ हुए। यहां बच्चों के पास कॉपी-किताबें, पेंसिल के पैसे नहीं थे तो स्टेशनरी की शुरुआत कर और बच्चों को बांटने लगे।