होशंगाबाद(ब्यूरो)। समाज में अपराधों का ग्राफ कम होने की जगह तेजी से बढ़ रहा है। सबसे चिंताजनक बात है कि अपराधियों में बढ़ी संख्या में युवा शामिल हैं। अपराध बढ़ने से जेल में बंदियों की संख्या भी बढ़ती ही जा रही है। इनमें कुछ सजायाफ्ता कैदी तो कुछ विचाराधीन बंदी हैं।

शासन की योजना के तहत राष्ट्रीय पर्व पर आचरण सुधार वाले तथा नियमों में लाभ मिलने वाले कैदियों की रिहाई होती रही है, लेकिन इस बार स्वतंतत्रता दिवस पर जेल से किसी भी बंदी की रिहाई नहीं हो सकी। अब प्रस्ताव में जिन बंदियों के नाम रिहाई के लिए भेजे गए थे। वे अपने बाहर आने की आस लगाए बैठे हैं। बढ़ते अपराधों ने जेलों को छोटा कर दिया है।

होशंगाबाद जैसे 12 लाख की जनसंख्या वाले जिले में ही केंद्रीय जेल, जिला जेल, महिला जेल, नवजीवन आम (खुली जेल) है। इसमें सबसे पुरानी 1830 में बनी जिला जेल को केंद्रीय जेल का दर्जा मिल चुका है। इसके बाद 1992 में एक और महिला जेल बनी। जो नवीन जेल के नाम से है। साथ ही पिपरिया और सिवनीमालवा में भी एक एक उपजेल बनी हुई है।

इन सभी की कुल क्षमता लगभग 480 है। इसमें होशंगाबाद महिला जेल जो कि बंद होने के बाद से 1997 से नवीन जिला जेल बन गई है, इसे छोड़कर बाकि सभी में क्षमता से अधिक कैदी हैं। इसके कारण बंदियों को कई तरह की समस्याओं से दो चार होना पड़ रहा है। हालांकि समय-समय पर मानव अधिकार आयोग के सदस्यों के अलावा आला अधिकारी यहां निरीक्षण करने पहुंचते हैं, लेकिन समस्याएं कम होने का नाम ही नहीं ले रहीं। इसके लिए जेल प्रशासन की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

केंद्रीय जेल में स्टाफ की कमी

जिला जेल को अब सेंट्रल जेल का दर्जा मिल चुका है। स्थापना के बाद से अब तक इसकी क्षमता और सुविधाओं के नाम पर इसमें सिर्फ मुख्य द्वार का ही पूर्ण निर्माण किया गया है। 230 बंदियों की क्षमता वाले इस जेल में 322 बंदी हैं। क्षमता से ज्यादा बंदी होने के कारण यहां स्टाफ की कमी भी बनी हुई है। वर्तमान में यहां 30 कर्मचारियों का स्टाफ है। स्टाफ की कमी की पूर्ति के लिए जेल प्रबंधन ने शासन से स्टाफ बढ़ाने की मांग भी की है। प्रभारी जेलर जेआर मंडलोई का कहना है कि जेल में स्टाफ की कमी बनी हुई है। इससे कई प्रकार की दिक्कतें आती हैं। वर्तमान में पांच-छह सिपाहियों की आवश्यकता है।

रखे जा रहे अन्य बंदी

1992 में महिला कैदियों के लिए बनी महिला जेल को 1997 से नवीन जिला जेल बना दिया गया है। यहां 10 वर्ष तक की सजा वाले कैदियों को रखा जाता है। 175 की क्षमता वाली इस जेल में अभी करीब 250 बंदी हैं। इस जेल में पहले बैतूल, हरदा और होशंगाबाद जिले के सजा काटने वाले बंदियों को रखा जाता था लेकिन धीरे-धीरे यहां अब अन्य बंदी को भी रखा जाने लगा है।

रिहाई के प्रस्ताव लंबित

स्वंतत्रता दिवस के अवसर पर हर जेल में चाल चलन के आधार पर अनेक कैदियों की रिहाई के प्रस्ताव के आधार पर सजायाफ्ता कैदियों की रिहाई की जाती है। इसके आधार पर जिले से भी करीब 15 के रिहाई प्रस्ताव शासन को गए थे, लेकिन इस बार देशभर में ही किसी कैदी की रिहाई नहीं हो सकी है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक 06 सप्ताह बाद कोर्ट से निर्देश आ सकते हैं। कई कैदियों को अपनी रिहाई का इंतजार हो रहा है।

बंदियों ने बनाया तालाब

नवीन जेल में बंदियों के लिए अनेक मनोरंजक और व्यवसायिक प्रशिक्षण की गतिविधियां चल रही हैं। यहां के बंदियों ने अप्रैल और मई माह में निःशुल्क श्रमदान कर परिसर में तालाब बना दिया है। अब जेल प्रबंधन इन बंदियों को मछली और सिंगाड़ा उत्पादन का प्रशिक्षण देने की तैयारी में है। जेल में सांस्कृतिक कार्यक्रम, बास्केटबाल प्रतियोगिता, भजन कीर्तन सहित प्रत्येक बैरिक में कलर टीवी की व्यवस्था है। जेल प्रबंधन ने आईटीर्आ के सहयोग से मोटर बाईडिंग, ट्रेक्टर मैकनिक, इलेक्ट्रीशियन, सिलाई, राज मिस्त्री और बढ़ईगिरी का प्रशिक्षण भी बंदियों को उपलब्ध कराया है। यहां अनेक संस्थाओं के द्वारा ध्यान योग और पौधरोपण जैसी गतिविधियां भी की जाती हैं।