श्री दुर्गा सप्तशती में है बूढ़ी माता के स्वरूप का उल्लेख

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केप्शन-इटारसी। क्षेत्र की प्रसिद्ध बूढ़ी माता, जहां दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु। नवदुनिया।

इटारसी। शहर के पश्चिमी छोर पर स्थित श्री बूढ़ी माता मंदिर सिद्ध शक्ति क्षेत्र माना जाता है। इस स्थान के महत्व को लेकर कई मान्यताएं जुड़ी हैं। नवरात्र के अलावा साल भर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। यहां विराजीं देवी दुर्गा बूढ़े स्वरूप में नजर आती हैं।

एक किवदंती के अनुसार मेहरागांव-इटारसी के बीच गोमती गंगा नदी किनारे माता खेड़ापति का निवास था। सन 1812 में राजस्थान में मुस्लिमों का युद्ध हुआ। इस युद्ध के पूर्व कई बंजारे एवं मारवाड़ी राजस्थान से बाहर की ओर चल दिए। जब इन लोगों का जत्था इटारसी से निकला तो इन्होंने जल और खुला मैदान देखकर डेरा डाला। अपने तंबू लगाए। इंसानों के साथ ही साथ ऊंट, गाडर, बकरी को भी स्थान व पानी की सुविधा मिली। यहां पर इन्होंने अपनी कुलदेवी माताजी चिलासेन को स्थापित किया। जब राजस्थान में लड़ाई समाप्त हुई, बंजारे वापस गए। इस दौरान उन्होंने कुलदेवी की प्रतिमा को भी ले जाना चाहा। तब माता जी बोलीं कि अब मैं यहीं रहूंगी। सभी बंजारों ने मिलकर निर्णय लिया और वे लखन सिंह बंजारा को देवी की सेवा में छोड़कर चले गए। कुछ दिनों तक लखनसिंह यहां पर रहा। कुछ समझ न आने की वजह से वह सलकनपुर जाकर रहने लगा। यहां पहाड़ पर अपने मवेशियों को चराता। इस तरह पूरा परिवार ही माता चिलासेन को भूल गया। एक दिन स्वप्न में उसे एक कन्या दिखाई दी और बोलीं कि मैं तेरी कुलदेवी चिलासे हूं। मुझे वहां अकेली छोड़कर तू भी यहां आ गया। यदि तू नहीं आ सकता, तो वहां मेरा स्थान बना दे। तेरे सारे कार्य ठीक से होने लगेंगे। उन्होंने माता जी से पूछा कि स्थान किस नाम से बनाऊं,तब उन्होंने कहा कि पहला नाम मेरा चिलासेन है और दूसरा नाम बीजासेन जाना जाए। इस तरह से माता चिलासेन का एक स्थान इटारसी में बनाया गया।

खामगांव से आया छत्र

कालांतर में देव नारायण पठारिया के पुत्र हिरजी भाई ने एक दाल मिल यहां बनाई। उन्होंने माताजी के यहां अपनी श्रद्धा से जाना प्रारंभ किया। सन 1961 में गोपीलाल अग्रवाल तगप्पा सेठ ने इस स्थान पर जाकर पूजन शुरू किया। धीरे-धीरे लोगों को इस स्थान के बारे में जानकारी लगी। भावसार बाबू, गोपीलाल, हीरजी भाई पगारे ने अन्य लोगों के साथ मिलकर इस स्थान पर एक छोटा पक्का चबूतरा बनवा दिया। माता जी की प्रतिमा लाकर यहां स्थापित की गई। सेठ गोपीलाल ने खामगांव महाराष्ट्र से मंगाकर चांदी का सवा किलो का छत्र चढ़ाया, जो आज भी मौजूद है। प्रतिवर्ष यहां शतचंडी महायज्ञ होता है। विधायक डॉ. सीतासरन शर्मा के नेतृत्व में समिति ने यहां सभी देवी-देवताओं के मंदिर, यज्ञशाला, धर्मशाला का निर्माण कराया।

Posted By: Nai Dunia News Network

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