उदय प्रताप सिंह इंदौर (नईदुनिया)

कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के कारण कई परिवारों पर आर्थिक रूप से विपरीत असर पड़ा है। इसी कारण कई कई माता-पिता निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अपने बच्चों को अब सरकारी स्कूलों में प्रवेश दिलवा रहे हैं। निजी स्कूलों में पिछले साल के मुकाबले ज्यादा संख्या में छात्र प्रवेश ले रहे हैं। सरकारी स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया 15 जुलाई तक चली। स्थिति यह है कि 30 से 40 फीसदी छात्र निजी स्कूलों से सरकारी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं।

सरकारी अहिल्याश्रम क्रमांक 1 स्कूल में पिछले वर्ष कक्षा नौवीं में 263 छात्रों ने प्रवेश लिया था। इसमें से 200 छात्र निजी स्कूलों के थे लेकिन ये उन निजी स्कूलों के थे, जहां कक्षा आठवीं के बाद कक्षा नौवीं नहीं संचालित होती थी। इस वर्ष कक्षा नौवीं के लिए अब तक 72 छात्र फॉर्म ले जा चुके हैं। इसमें से 50 छात्र ऐसे निजी विद्यालयों के हैं, जहां कक्षा आठवीं के बाद भी नौवीं कक्षा भी संचालित हो रही है। पिछले वर्ष इस स्कूल में कक्षा ग्यारहवीं में 175 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया था जो निजी स्कूलों के थे। इसमें 168 छात्र ऐसे विद्यालयों के थे, जहां अगली कक्षा संचालित नहीं होती थी। इस वर्ष चार दिन में अब तक कक्षा ग्यारहवीं में प्रवेश के लिए 100 फॉर्म छात्र ले जा चुके हैं। इनमें से 96 छात्र ऐसे निजी स्कूलों से हैं, जहां अगली कक्षाएं संचालित होती हैं।

शासकीय अहिल्याश्रम क्रमांक 1 की प्राचार्य पूजा सक्सेना के अनुसार, प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने के बाद हमारे पास एक दिन में 80 छात्रों के फोन आ रहे हैं। पिछले साल के मुकाबले इस बार ज्यादा संख्या में निजी स्कूलों के छात्रों ने एडमिशन फॉर्म लिए हैं। इस बार निजी स्कूलों से करीब 50 फीसद छात्र सरकारी स्कूल में आने की तैयारी में हैं। कई परिवार आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने से छात्रों को सरकारी स्कूलों में छात्रों को प्रवेश दिलवा रहे हैं।

शासकीय नूतन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, चिमनबाग के प्राचार्य मनोज खोपकर ने बताया कि इस बार कई अभिभावक अपने बच्चों के साथ आकर सरकारी स्कूलों को देख रहे हैं और सुविधाओं की जानकारी ले रहे हैं। पिछले साल के मुकाबले इस बार हमारे स्कूल सहित सभी सरकारी स्कूलों में ज्यादा संख्या में प्रवेश होने की संभावना है।

शासकीय उमावि नंदाननगर के प्राचार्य राजू मेहरा के अनुसार, हमारे स्कूल में इस बार अभी तक निजी स्कूलों के 30 फीसदी छात्रों ने प्रवेश लिया है और अब भी कई छात्र आवेदन पत्र लेकर जा रहे हैं। इस बार पिछले साल के मुकाबले निजी के स्कूलों के छात्रों के ज्यादा प्रवेश होने की स्थिति बन रही है।

केस-1 : फर्नीचर का काम रहा बंद

बाणगंगा स्थित गोविंद कॉलोनी में रहने वाली रिया सेन ने दसवीं तक पढ़ाई निजी स्कूल में की और इन्हें इस बार 69 प्रतिशत अंक आए। इनके पिता लाल बाबू फर्नीचर का काम करते हैं। लॉकडाउन के कारण फर्नीचर का काम बंद रहा। बेटी को दसवीं तक निजी स्कूल में पढ़ाया। लॉकडाउन व कोरोना संक्रमण के कारण उनका काम काज अच्छा नहीं चल रहा। बजट इतना नहीं कि बेटी को निजी स्कूल में पढ़ा सके। इस वजह से अब उसका सरकारी स्कूल में प्रवेश करवा रहा है।

केस-2 : चारों बेटियों की फीस भरना कठिन

बाणगंगा क्षेत्र में रहने वाली नंदिनी प्रजापत निजी स्कूल में पढ़कर दसवीं में 51 प्रतिशत अंक लाई। पिता मजदूरी करते हैं और मां घर में सिलाई मशीन चलाती हैं। परिवार में चार बेटियां हैं। मां रिंकी प्रजापत के अनुसार लॉकडाउन के कारण पति को तीन महीने तक घर पर रहना पड़ा तो सिलाई का कामकाज भी ज्यादा नहीं चल रहा। बेटियों की फीस भरना संभव नहीं। इस वजह से चारों बेटियों को निजी स्कूल से निकाल कर अब सरकारी स्कूल में प्रवेश दिलवा रहे हैं।

केस-3 : दसवीं में 90 प्रतिशत अंक, अब 15 किमी दूर सरकारी स्कूल में भेजेंगे

अरबिंदो हॉस्पिटल के पास रहने वाली शिवांशी निजी स्कूल में पढ़ते हुए कक्षा दसवीं में 90 प्रतिशत अंक से उत्तीर्ण हुई लेकिन अब ग्यारहवीं में उसे 15 किमी दूर सरकारी स्कूल में जाना होगा। शिवांशी की छोटी बहन दिव्यांशी को भी कक्षा नौवीं की प़ढ़ाई के लिए सरकारी स्कूल ही जाना होगा। शिवांशी के पिता फैक्टरी में काम करते हैं। लॉकडाउन के कारण तीन माह तक उन्हें घर पर रहना पड़ा और अब फिर से उनकी नौकरी शुरू हुई। उनकी मां निजी स्कूल में पढ़ाती थीं लेकिन स्कूल बंद होने से उनका काम भी बंद हुआ। इससे घर की आर्थिक स्थिति पर असर पड़ा। आर्थिक दिक्कतों के चलते मां-बाप अब दोनों बेटियों को 15 किमी दूर सरकारी स्कूल में पढ़ने को भेजने को मजबूर हैं।

योग्य शिक्षक हैं

निजी स्कूलों के साथ सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए आ रहे हैं। यह सरकारी स्कूलों के लिए सुनहरा मौका है। हर सरकारी स्कूल में शिक्षक यदि उत्कृष्ट व मॉडल स्कूलों की तरह काम करें तो यहां हमेशा छात्रों की संख्या बेहतर हो सकती है। सरकारी स्कूलों के शिक्षक अधिक योग्यता वाले व श्रेष्ठ हैं। कुछ वर्षों पहले तक तो सरकारी स्कूल ही होते थे और वहां ही अधिकांश छात्र पढ़ने जाते थे। सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक सुविधाएं पालक-शिक्षक संघ, जिला पंचायत व स्थानीय निकाय के माध्यम से बढ़ाई जा सकती है। प्रदेश में सरकारी स्कूलों के प्रति सरकार में सकारात्मक इच्छाशक्ति नहीं है। यदि दिल्ली की तर्ज पर यहां के सरकारी स्कूलों में भी सुविधाएं बढ़ाई जाए तो कई लोग अपने बच्चों को मजबूरी से नहीं स्वेच्छा सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजेंगे।

- डॉ केके पांडेय, सेवानिवृत्त संयुक्त संचालक

लोक शिक्षण संचालनालय

Posted By: Nai Dunia News Network

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