रुमनी घोष, इंदौर (नईदुनिया)। रंगों के त्योहार होली में पर्यावरण बचाने का अनूठा, नया रंग और गहरा हो गया। मध्यप्रदेश के कस्बों से लेकर महानगरों तक में कंडों की होली जलाने के लिए जागरूकता ने ऐसा असर दिखाय कि बुधवार को रिकॉर्ड करीब 6700 जगहों पर कंडों की होलिका का दहन हुआ। इसमें करीब 70 लाख कंडों का उपयोग हुआ और इससे लगभग 5700 क्विंटल लकड़ी बची यानी जंगल बचा। ग्वालियर-चंबल अंचल में पशुधन अधिक होने से इस इलाके में कंडों का भी रिकॉर्ड उपयोग हुआ। इंदौर से शुरू हुए इस अभियान को लोगों ने अपनी जिम्मेदारी का हिस्सा बना लिया।

'नईदुनिया' द्वारा प्रदेश में लगातार तीन साल से चलाए जा रहे अभियान 'फिर जलाएं कंडों की होली' से हजारों संस्थाएं सक्रिय रूप से जुड़ीं। सदस्यों ने कंडों से ही होलिका जलाने का संकल्प लिया और बुधवार को शुभ मुहुर्त में इसे पूरा किया।पर्यावरणविदों ने जागरूकता के लिहाज से इस बदलाव को ऐतिहासिक बताया। मप्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल के विशेषज्ञ डॉ. योगेंद्र कुमार सक्सेना के मुताबिक भोपाल में 30 फीसदी गौ-काष्ठ (गोबर के कंडे या लकड़ी) का उपयोग करने की तैयारी की गई थी, परिणाम उम्मीद से कहीं अधिक आया।

भोपाल की गोशालाओं के अलावा ग्वालियर से भी गौ-काष्ठ मंगाया था। कई सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं ने तो कंडों का निशुल्क वितरण भी किया। जबलपुर में निगम ने 50 हजार कंडे समर्थ भैयाजी सरकार के सहयोग से तिलवारा के दयोदय तीर्थ में बनवाकर वितरित किए। इंदौर में वन विभाग के अनुसार, लकड़ी की मांग में 80 फीसदी तक की गिरावट आई है।

ऐसे शुरू हुआ कंडों की होली का अभियान

होली के एक महीने पहले मप्र होली का डांडा गाड़े जाने की परंपरा है। यह होली की तैयारी का संकेत होता है। इंदौर के 50 व्यापारियों और कारोबारियों ने मिलकर हिसाब लगाया कि जंगल, गाय और पर्यावरण बचाने के लिए यदि गाय के गोबर के कंडों की होली जलाई जाए तो इस एक दिन के लिए कंडों से होने वाली आमदनी से प्रदेशभर की लाखों गाएं खुद ही सालभर का खर्च निकाल लेंगी। इस आइडिया को लेकर वे फरवरी 2017 में नईदुनिया के कार्यालय आए थे। गाय अपना खर्च कैसे निकाल सकती है? इसका फायदेमंद फॉर्मूला तैयार करने वाले व्यापारी मनोज तिवारी, गोपाल अग्रवाल और राजेश गुप्ता ने बताया। यह फॉर्मूला इस प्रकार था- मप्र में सरकार के अधीन 664 गोशालाएं हैं, जिनमें लगभग 1.20 लाख गाएं हैं।

- एक गाय अमूमन 10 किलो गोबर देती है। इस हिसाब से मप्र में रोजाना 12 लाख किलो गोबर निकलता है। इसका निस्तारण बड़ी समस्या है। पानी के स्रोतों में बहाने से जल प्रदूषण होता है।

- 10 किलो गोबर से 5 कंडे बनते हैं और प्रदेशभर में एक दिन में 12 लाख कंडे बन सकते हैं।

- एक कंडे की कीमत 10 रुपए है। इसमें दो रुपए गोशालाओं में कंडे बनाने वाले कर्मचारियों को दिया जाए और दो रुपए परिवहन का खर्च निकाल लिया जाए तो कंडे उपलब्ध करवाने वाली गोशालाएं स्वावलंबी हो जाएंगी।

- 2017 में नईदुनिया ने व्यापारियों की इस पहल को सबसे पहले प्रकाशित किया। फिर उसे अभियान का रूप दे दिया गया। यह तीसरा साल है।

इतना नुकसानदेह है लकड़ी जलाना

एक टन लकड़ी जलने से वातावरण में 85 किलो कार्बन डाइऑक्साइड घुलती है। इसके अलावा कार्बन मोनोऑक्साइड सहित अन्य हानिकारक प्रदूषित तत्व बढ़ जाते हैं। यही नहीं, विशेषज्ञों के मुताबिक 200 पौधे पनपने के बाद उसमें से केवल दो ही पेड़ बन पाते हैं। वे भी कट जाएंगे तो जंगल कैसे बचेगा?

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