Anhad Nad Column: ईश्वर शर्मा, इंदौर (नईदुनिया)। बीते द‍िनों स्वामी व‍िवेकानंद की जन्मतिथि को सबने अपने-अपने तरीके से मनाया। क‍िसी ने उन्हें याद किया तो क‍िसी ने उनकी स्मृति में व्याख्यानमाला आयोजित की। एक संत ऐसे भी रहे, जिन्होंने स्वामीजी को सच्चे अर्थों में याद किया। ये संतश्री विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के पहाड़ों में गए और पूरा दिन साधना में डूबे रहे। एकांत वन में, नीरव शांति में स्वयं से भेंट करने का और स्वयं को जानने का एक गहरा प्रयास। साधना के क‍िसी मंगल क्षण में उन्होंने बुदबुदाया होगा गीता का यह श्लोक...

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिण: |

जन्मबन्धविनिर्मुक्ता: पदं गच्छन्त्यनामयम् ||

जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति‍ का यह उपाय भारत के मनीषी अनादिकाल से करते रहे हैं। इन संतश्री ने भी यही जपा।

क्रूरता का न‍िशान म‍िटा तो भारत-प्रेमि‍यों ने मनाई खुशी

बीते सप्ताह भोपाल के समीप मुगल काल की एक ऐसी न‍िशानी को हटाने-म‍िटाने की शुरुआत हुई, जो भारत की पीठ में क‍िसी खंजर के न‍िशान जैसी थी। यह न‍िशानी थी इस्लाम नगर। अफगानि‍स्तान से आए दुर्दांत लुटेरे दोस्त मोहम्मद खान ने वर्ष 1707 से 1728 के बीच भोपाल के इर्द-गिर्द के इलाके पर कब्जा कर शासन किया था। तब इस क्रूर सैनिक ने जगदीशपुर नामक सुंदर कस्बे को तहस-नहस कर उसका नाम इस्लाम नगर कर द‍िया था। यह मुगल शासकों की सनक थी क‍ि जो भी कुछ श्रेष्ठ है, उस पर बलात कब्जा करके उसे अपना नाम दे दो।

किंतु समय होत बलवान। वक्त ने करवट बदली और हाल ही में यहां लगे एक बोर्ड पर इस्लाम नगर का नामकरण जगदीशपुर कर दिया गया। दिलों में तो यह जगदीशपुर ही था, बस कागज में बदलना है।

एक क्षण में उस शख्स ने अपना बचपन जी लिया

बचपन कब, कहां, क्या कर गुजरे, इसका कोई हिसाब-क‍िताब नहीं होता। ऐसा ही कुछ बीते सप्ताह हुआ। इंदौर के बायपास स्थि‍त गांव बिचौली मर्दाना के समीप मध्यमवर्गीय परिवारों के कुछ बच्चे व किशोर इकट्ठा हुए और घर से आटा-दाल लाकर एक बिल्डिंग के पीछे खुली जगह में कंडों पर बाटी सेंकने लगे। इन्हें अनुभव नहीं था, इसलिए कंडे कम पड़ गए और बाटी अधपकी रह गई। यह सब एक भद्र व्यक्ति बिल्डिंग के चौथे माले पर स्थि‍त अपने फ्लैट से देख रहे थे। वे तुरंत नीचे आए, साथ में घर से कंडे और घी ले आए। उन्होंने बच्चों की बाटी सिंकवाई, उन्हें घी दिया और साथ में द‍िया बहुत-सा प्रेम और आशीर्वाद। दरअसल, इस शख्स ने उस एक क्षण में मानो अपना बचपन जी लिया।

सड़क के सफर व शास्त्रीय संगीत के स्वर की जुगलबंदी

इंदौर‍ियों में इस बात का एक दर्प, एक सकारात्मक अहंकार है क‍ि हम लोग कुछ विशिष्ट हैं। यही वजह है क‍ि ये कुछ नया करने, कुछ अलहदा करने और कुछ द‍िलचस्प करने में व‍िश्वास करते हैं। और ऐसा करने के लिए न‍ित-नूतन प्रयोग भी करते हैं। बीते सप्ताह इंदौर की एक शास्त्रीय गायि‍का ने ऐसा ही क‍िया। उन्होंने मंच पर गायि‍की के दौरान पहनी जाने वाली वेशभूषा अर्थात साड़ी पहनी, संपूर्ण श्रृंगार क‍िया और अपनी कार उठाकर लांग ड्राइव पर न‍िकल गईं। है ना कुछ नया, अनूठा और अलग-सा। जिंदगी को फुल-मस्ती में जीने का यह अंदाज तब और मजेदार हो गया, जब वे हवा से बात करती कार में तबला और पखावज का म्यूजिक लगाकर उसके साथ-साथ शास्त्रीय गीत भी गुनगुनाती रहीं। सफर और स्वर की यह जुगलबंदी अद्भुत रही।

Posted By: Hemraj Yadav

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