इंदौर। गत वर्ष कृष्णपुरा छत्री पर गणेशोत्सव के दौरान बाहुबली गणेश की स्थापना की गई थी। मंगलमूर्ति की सूंड पर गिलहरी ने बच्चों को जन्म दिया था, जिसके चलते काफी दिन तक विसर्जन टाला गया था। इस साल गणेशोत्सव में जब गणेश जी की स्थापना की गई तो मूषक के साथ गिलहरी परिवार को भी जगह दी गई। घोंसला भी रखा गया। नाम रखा-बाहुबली गिलहरी गणेश।

सितंबर 2017 में 'बाहुबली गणेश' पंडाल में जब विसर्जन का समय आया तब तक बप्पा के सूंड रूपी 'गर्भ' में नन्ही-नन्ही गिलहरियां जीवन पा चुकी थीं। आयोजक दिनभर असमंजस में रहे कि मुहूर्त में विसर्जन करें या नन्हे जीवों को बचाए। आखिर नन्ही गिलहरियों के लिए बप्पा विसर्जित नहीं हुए। इसके करीब 23 दिन बाद यहां बप्पा का विसर्जन हुआ।

कृष्णपुरा छत्री के पास श्री योगीबाबा बमबमनाथ सेवा समिति द्वारा बीते कई वर्षों से गणपति की स्थापना की जा रही है। 2017 में श्यामवर्णीय मूर्ति के रूप में लंबोदर विराजे थे, भक्तों ने उन्हें बाहुबली गणेश का नाम दिया।

गिलहरी बेहद शर्मिली होती है। थोड़ी सी आहट सुनते ही भाग जाती है। इतने शोर के बीच उसने बप्पा के सूंड को ही चुना। पूजा के बाद जैसे ही समिति के सदस्य मूर्ति को विसर्जन के लिए उठाने आगे बढ़े तो सूंड के पास गिलहरी दिखाई दी। भीतर से छोटे-छोटे बच्चों की आवाज भी आ रही थी। इस पर सभी रुक गए। काफी देर विचार के बाद तय किया की यदि विसर्जन किया तो गिलहरियां भी पानी में बह जाएंगी। करीब 23 दिन बाद गिलहरी अपने बच्चों को ले गई और फिर मूर्ति का वहीं विसर्जन हुआ।

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