सुमेधा पुराणिक चौरसिया, इंदौर। Indore News दस साल के राकेश, रीना और राजू के पास घर का सामान खरीदने के बाद दो रुपए भी बचते हैं तो वे चॉकलेट-बिस्किट पर खर्च करने के बजाय सीधे 'बैंक' (Children Bank) में जमा करने जाते हैं। लाखों-करोड़ों के लेनदेन के इस दौर में दो रुपए भी बैंक में जमा होते हैं, यह सुनकर आश्चर्य होना स्वाभाविक है। लेकिन, छत्रीपुरा क्षेत्र में रहने वाले जरूरतमंद बच्चे एक- दो रुपए बचत कर अपना 'बैंक बैलेंस' तैयार करते है। उन्हें जरूरत पड़ने पर बैंक से 500 रुपए तक लोन भी मिल जाता है। छत्रीपुरा पुलिस थाने में संचालित संजीवनी बालमित्र केंद्र द्वारा 'चिल्ड्रन बैंक' (Children Bank) शुरू किया गया है। शुरुआत तो 2016 में हुई, अब 150 बच्चे जुड़ गए हैं। कमजोर तबके के 14 वर्ष तक के बच्चे खाताधारक हैं। बैंक में एक से दस रुपए तक राशि जमा करते हैं। बच्चों में से ही मैनेजर, कैशियरर भी बनाए गए हैं।

कॉपी-किताब खरीदने या जन्मदिन मनाने लेते हैं लोन

एक तरफ जहां बैंकिंग से बच्चों में बचत की आदत लग रही है, वहीं उन्हें छोटी-छोटी जरूरतों के लिए माता-पिता से बार-बार पैसे नहीं मांगने पड़ते। कॉपी-किताब खरीदने, जन्मदिन मनाने या जरूरी सामान खरीदने के लिए बैंक से लोन लेते हैं। फिर धीरे-धीरे पैसे बचा किस्त भरते हैं जो एक, दो या पांच रुपए की होती है।

नैतिक शिक्षा और देश प्रेम की भावना जगा रहा केंद्र

शासन के निर्देश पर वर्ष 2005 में सामुदायिक पुलिसिंग के तहत पुलिस थानों में संजीवनी बालमित्र केंद्र खोले गए थे। इंदौर में संयोगितागंज, एरोड्रम और छत्रीपुरा थाने में केंद्र शुरू हुए थे। दो केंद्र तो कुछ समय बाद ही बंद हो गए, लेकिन छत्रीपुरा थाना पुलिस थाने में आसपास के कई बच्चे केंद्र से जुड़े हैं। यहां पुलिस आरक्षक संजयसिंह राठौर छह से 14 वर्ष तक के बच्चों को नैतिक शिक्षा, पर्यावरण व स्वास्थ्य, राष्ट्र प्रेम, सामान्य ज्ञान, अंग्रेजी और कम्प्यूटर की पढ़ाई कराते हैं। उपेक्षित परिवारों के बच्चों को घर से केंद्र में लाया जाता है और सालभर तक केंद्र से जोड़कर रखा जाता है। केंद्र से निकले 300 बच्चे वयस्क होकर अलग-अलग रोजगार से जुड़ गए हैं।

डॉक्टर-इंजीनियर न सही, पर नेक इनसान जरूर बनेंगे

प्रधान आरक्षक और संजीवनी केंद्र के समन्वयक संजय सिंह कहते हैं कि हमारा मुख्य मकसद बच्चों को खराब माहौल से निकाकर उनके मन-मस्तिष्क को शुद्ध करना है। इसके बाद उनके विचार और काम अपने आप अच्छे होने लगते हैं। सालभर तक बच्चों को बुनियादी शिक्षा देते हैं। इसके बाद स्कूल में एडमिशन कराते है। प्रत्येक बच्चा निगरानी में रहता है। हम बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर तो नहीं, लेकिन नेक इनसान बनने में मदद करते हैं।

Posted By: Prashant Pandey