अश्विन बक्शी, इंदौर। बच्चों के प्यारे चाचा नेहरू के दो सपने थे। पहला बच्चों को प्यार दिया जाए और दूसरा उन्हें उनके पैरों पर खड़ा किया जाए। उनके सपने को पूरा करने के लिए छोटी सी पहल जरूरी है। इंदौर की कुछ संस्थाओं के लोग अपने ही स्तर पर इस कोशिश में जुटे हुए हैं। एक संस्था ने सरकारी स्कूल में सुविधाएं जुटाईं और वहां मिले प्यार व प्रोत्साहन से सालभर में ही उपस्थिति 30 से बढ़कर 90 प्रतिशत हो गई। वहीं दूसरी ओर एक व्यक्ति ने अलग-अलग बस्तियों में जाकर बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया। इस कारण अब तक दिशाहीन चल रहे 65 बच्चों को राह मिली। कनाड़िया गांव के पास टिगरिया राव शासकीय प्राथमिक विद्यालय में आसपास की कांकड़ से बच्चे पढ़ने के लिए पहुंचते हैं।

यह वे बच्चे हैं, जिनके माता-पिता दिहाड़ी कर अपना गुजारा कर रहे हैं। एक साल पहले छाजेड़ परिवार इंदौर मंडल के महावीर छाजेड़ स्कूल पहुंचे और बच्चों को स्वेटर उपहार में दी। स्वेटर पाकर बच्चे बेहद खुश हुए। कुछ दिन बाद मंडल के सदस्य वापस पहुंचे व स्कूल को गोद लेने के लिए प्रस्ताव रखा और काम शुरू किया। कभी बच्चों को सफाई का फायदा बताकर टूथब्रश, साबुन, टॉवेल उपहार में दिए तो कभी स्कूल बैग व पुस्तकें बांटी। पीने के पानी की व्यवस्था के साथ ही बेंच व दरी की व्यवस्था कराई।

नियमित गतिविधियों के साथ ही हर त्योहार पर परिवार के सदस्य स्कूल पहुंचते हैं। लगातार हो रही इन गतिविधियों ने बच्चों की मनोदिशा परिवर्तित कर दी है। प्रधान अध्यापक मनोज मालवीय के अनुसार स्कूल में 78 बच्चे दर्ज हैं। एक साल पहले तक इनमें से 35 बच्चे ही पहुंचते थे। अब उपस्थिति 90 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।

बस्तियों में पढ़ाया, 65 बच्चे जाने लगे स्कूल

पांच साल पहले विजय नगर के रहने वाले पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर गुरविंदर सिंह ने बस्तियों में पढ़ाना शुरू किया। देवगुराड़िया व बॉम्बे अस्पताल के पीछे बस्ती में वे नियमित पहुंचते हैं। पहले कम बच्चे पढ़ने में रुचि दिखाते थे, लेकिन अब इनकी संख्या डेढ़ सौ से भी अधिक हो चुकी है। उन्होंने बच्चों को रहन-सहन का तरीका सिखाया। ब्रश करना, सफाई रखना भी सिखाया। यहां तक कि बस्ती के बच्चों को वे खुद अपने हाथ से नहलाते भी हैं। लगातार जाने का यह फायदा हुआ कि हर बस्ती से पहली से लेकर 12वीं तक के 50 से 60 बच्चे रोजाना पढ़ाई के लिए आते हैं।

इन बच्चों को देख वे बच्चे भी पहुंचे जो पढ़ना तो चाहते थे, लेकिन मार्गदर्शन नहीं मिला था। लगातार प्रयास का यह फायदा हुआ कि अब 65 बच्चे नियमित स्कूल जा रहे हैं। इनमें से कुछ बच्चे 10वीं व 12वीं में प्रथम स्थान पर पहुंचे हैं। गुरविंदर सिंह ने बताया कि वे पहले कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर थे। छह साल पहले नौकरी छोड़ी। उसके बाद से बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं। बस्तियों के 65 बच्चों की फीस की व्यवस्था भी की है। इस प्रयास से प्रेरित होकर कई लोग बच्चों की फीस का खर्च उठा रहे हैं, ताकि बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो सकें।

Posted By: Prashant Pandey