इंदौर। प्रदेश की आर्थिक राजधानी और मिनी मुंबई कहलाने वाले इंदौर शहर ने पिछले कुछ दशकों में विकास के नए कीर्तिमान रचे हैं। उद्योग, अधोसंरचना, जीवन शैली, परिवहन हर क्षेत्र में इंदौर किसी भी महानगर को टक्कर देने के लिए हमेशा तैयार खड़ा नजर आता है। मॉल और पब कल्चर वाला इंदौर अपनी परंपराओं को भी खूब सहेजे हुए है।

अनंत चतुर्दशी पर निकलने वाली झांकियों की सौ साल पुरानी परंपरा न सिर्फ कायम है, बल्कि अपने पुराने स्वरूप को भी समेटे हुए है। आज भी अनंत चौदस की रात जब झिलमिलाती झांकियों का कारवां गुजरता है तो इंदौरी इन्हें निहारने सड़क पर उतर आते हैं। हर साल यह संख्या बढ़ रही है। जमाना भले ही डिजिटल हो गया लेकिन दशकों से मैकेनिकल सिस्टम पर बन रही इन झांकियों को लेकर लोगों का उत्साह बरकरार है।

अनंत चौदस की शाम शुरू होने वाला झांकियों का कारवां अगले दिन अलसुबह तक वापस मिलों में पहुंचता है। पुरानी तकनीक के सहारे ही झांकियां आज भी जीवंत होती हैं। बस बदले हैं तो उनके विषय। पहले धार्मिक विषयों पर 90 प्रतिशत झांकियां होती थीं। अब इनमें समसामयिक और राजनीतिक विषय भी शामिल होने लगे हैं। 'नईदुनिया' ने इस परंपरा को जिंदा रखने में महती भूमिका निभाने वालों से चर्चा की।

हर मजदूर देता था एक दिन का वेतन

मिल में झांकी बनाने की तैयारियां एक महीने पहले से शुरू हो जाती थीं। इंदौर की हर मिल का हर मजदूर एक दिन का वेतन इसके लिए देता था। मिल प्रबंधन भी इस परंपरा को निभाने में महती भूमिका निभाता था। वह संसाधन उपलब्ध कराने के साथ-साथ आर्थिक सहयोग भी करता था। मजदूरों में भी झांकी बनाने को लेकर उत्साह रहता था। इनमें से मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल का काम जानने वालों की ड्यूटी झांकी बनाने में लगाई जाती थी। झांकियों की थीम को लेकर भी कई दिनों तक मंथन होता था।

हरनामसिंह धालीवाल, मिल मजदूर नेता

10 दिन तक मनता था उत्सव

मिल क्षेत्र में गणेशोत्सव की धूम पूरे 10 दिन तक रहती थी। मिलों में कव्वाली, कवि सम्मेलन, कठपुतलियों का प्रदर्शन, धार्मिक नाटक होते थे। कवि सम्मेलनों में राष्ट्रीय स्तर के कवियों को बुलाया जाता था। मिल परिसरों में होने वाले इन आयोजनों में रात-रात भर लोग जुटे रहते थे। प्रबंधन का दखल होने के बावजूद ये मजदूर ही तय करते थे कि किस दिन कौन सा आयोजन होगा। मैनेजमेंट के सहयोग से कच्चा मटेरियल मुफ्त मिलता था। यही वजह थी कि झांकियों की लागत कम आती थी।

नरेंद्र श्रीवंश, हुकमचंद मिल गणेशोत्वस समिति के प्रधानमंत्री

पहले किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता था

पहले हमें किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता था। हर मजदूर एक दिन का वेतन देता था। मिल प्रबंधन भी दिल से मदद करता था। अब हालात बदल गए हैं। दो लाख रुपए आईडीए ने दिए हैं तो एक लाख रुपए नगर निगम ने। 50 हजार रुपए सज्जनसिंह वर्मा ने दिए हैं। विधायक रमेश मेंदोला ने 25 हजार रुपए की मदद करने का आश्वासन दिया है।

कैलाश कुशवाह, अध्यक्ष, मालवा मिल गणेशोत्सव समिति