इंदौर। सत्संग में इंद्रियों का दमन और मन की शुद्धि होती है। सत्संग संतों और महापुरुषों की पाठशाला होती है। अतः कुसंग त्याग कर सत्संग में जाना चाहिए। संत-महापुरुष जब ज्ञान की बातें बतलाते हैं तो काल भी अपना काम रोककर सुनने लगता है। सत्संग की महत्ता जो समझ गया, वह भव सागर से तर गया। यह बात जय गुरुदेव आश्रम के तीन दिनी स्थापना दिवस समारोह के समापन अवसर पर अनुयायी भभूतराव अन्नाा ने कही। इस अवसर पर सैकड़ों की संख्या में आए अनुयायी ने भजन-कीर्तन के साथ सेवा कार्य भी किए। इस दौरान अध्यक्ष चतरसिंह राजावत, छोटेलाल जायसवाल, मोहन सलवारिया आदि मौजूद थे।

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