लोकेश सोलंकी, इंदौर, Coronavirus Variant। कोरोना वायरस के अब तक साढ़े पांच हजार से ज्यादा म्यूटेंट वैरिएंट (उत्परिवर्ती या बदला हुआ प्रकार) सामने आ चुके हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) इंदौर ने अपने शोध में यह दावा किया है। कोरोना वायरस में मौजूद प्रोटीन में बदलाव से उसका स्वरूप बदलता है। इसी प्रोटीन का जुड़ाव या बंधन बदलने से ही वायरस का प्रकोप और प्रभाव भी बदल रहा है। इन वैरिएंट में से लगभग सभी भारत के मरीजों में मिल चुके हैं। आइआइटी इंदौर के बायोसाइंस और बायोमेडिकल साइंस विभाग के इस शोध को अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल 'हेलियान" ने प्रकाशित किया है। देश में महामारी के आने के साथ ही आइआइटी इंदौर की वायरोलाजी लैब कोविड-19 के अध्ययन में लगी है। ताजा शोध को आइआइटी के बायोसाइंस के प्रोफेसर हेमचंद्र झा और छह अन्य शोधार्थियों ने मिलकर अंजाम दिया है। प्रो. हेमचंद्र के अनुसार कोरोना के लिए जिम्मेदार वायरस सार्स कोविड-19 में तीन प्रमुख तरह के प्रोटीन होते हैं।

ई, एम और एस नाम से पहचाने जाने वाले इन प्रोटीन में से किसी एक या एक से ज्यादा का स्वरूप समय के साथ बदल जाता है। आइआइटी ने दुनियाभर में वायरस के 22 हजार प्रोटीन आइसोलेट यानी नमूनों का अध्ययन किया। इसमें यूके, अमेरिका, भारत और अन्य देशों में मिले नमूने शामिल हंै। जुलाई 2020 तक दुनियाभर की लैब में पहुंचे वायरस के नमूनों से ये पृथक किए गए थे। नमूनों के अध्ययन में कोरोना वायरस के कुल 5,647 म्यूटेंट वैरिएंट सामने आ चुके हैं।

स्पाइक प्रोटीन में सबसे ज्यादा बदलाव

प्रो. हेमचंद्र के अनुसार अध्ययन में वायरस के ई-प्रोटीन के 42 म्यूटेंट, एम-प्रोटीन के 156 म्यूटेंट और एस प्रोटीन यानी स्पाइक प्रोटीन के 5449 म्यूटेंट पहचाने गए। इससे साफ है कि सबसे ज्यादा एस यानी स्पाइक प्रोटीन में म्यूटेशन (उत्परिवर्तन या बदलाव) हो रहा है। वायरस के बाहरी आवरण पर कांटों की तरह दिखने वाले प्रोटीन को ही स्पाइक प्रोटीन कहा जाता है। म्यूटेंट में प्रोटीन में बदलाव होता है तो उसकी बाइंडिंग यानी जुड़ने की क्षमता भी बदल जाती है इसीलिए हर वैरिएंट का वायरस अलग तरह से असर करता है। वायरस का प्रोटीन ही मानव शरीर में पाए जाने वाले एस-2 रिसेप्टर से जुड़कर उसे संक्रमित करता है।

अब तक कई शोध

ताजा शोध को प्रो. हेमचंद्र झा के साथ मिलकर आइआइटी के शोधार्थियों श्वेता जखमोला, ओमकार इंदारी, धर्मेंद्र कश्यप, निधि वार्ष्णेय, अयान दास और मनीवनन इलंगोवन ने पूरा किया है। आइआइटी इंदौर की वायरोलाजी लैब इससे पहले कोरोना वायरस से मस्तिष्क की बीमारियों के खतरे को भी अपने शोध से साबित कर चुका है।

वाराणसी में भी हुआ है वायरस पर शोध

कोविड-19 वायरस पर एक शोध वाराणसी के काशी हिंदू विश्वविद्यालय में भी हुआ है। यहां के जंतु विज्ञान विभाग के जीन विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि कोविड-19 का आरएनए वायरस 29903 बेस पेयर सीक्वेंस अथवा न्यूक्लियोटाइड का बना हुआ है। इसका हर एक न्यूक्लियोटाइड म्यूटेशन का कारक हो सकता है। म्यूटेशन प्राणियों में क्रमिक विकास की एक सतत प्रक्रिया है। इस अध्ययन में पाए गए पांच हजार से अधिक म्यूटेशन इस बात का प्रमाण हैं कि कोरोना वायरस अभी तक अपनी संक्रामक प्रकृति को मजबूती प्रदान कर रहा है।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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