इंदौर, COVID Advise। रोग बाह्य और आंतरिक दो कारणों से होते हैं। बाह्य कारण में वातावरण में फैले सूक्ष्म जीव, वायरस, फंगस, बैक्टीरिया आदि आते हैं। आंतरिक कारण में इन्हीं बाह्य जीवों को शरीर के अंदर पर्याप्त वृद्धि में सहायता करने वाले कारण और द्रव्य होते हैं। इससे इन रोगाणुओं को पनपने का माध्यम मिल जाता है और रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इस रोगाणुओं को शरीर में नहीं पनपने देना ही आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से रोग प्रतिरोधक क्षमता कहलाती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर बनाने के लिए आयुर्वेद आहार, निद्रा, दिनचर्या, ऋतुचर्या आदि के पालन पर बल देता है।

आहार के नियमानुसार गरम भोजन करना, घी डालकर भोजन करना, पहले का भोजन पचने पर दूसरा भोजन करना, शांत मन से भोजन करना आदि शामिल हैं। रोग की प्रारंभिक अवस्था में भोजन पूर्व अदरक का एक सेंटीमीटर का टुकड़ा सेंधा नमक के साथ खाएं। सुपाच्य भोजन जैसे मूंग दाल का सूप, सब्जियों का सूप, मूंग दलिया की खिचड़ी, लौकी, तोरई, गिल्की का उपयोग, मसालों में जीरा, कालीमिर्च, लहसुन, धनिया, अजवाइन का प्रयोग करें और जब पाचन क्षमता अच्छी होने लगे तो सामान्य आहार लें। इन नियमों के पालन से शरीर में दोषों का संतुलन बना रहता है और रोग नहीं होते।

यदि इनका संतुलन बिगड़े तो ऋतु अनुसार पंचकर्म करें। पंचकर्म में वमन, विरेचन, बस्ती, नस्य और रक्तमोक्षण हैं। सामान्य व्यक्ति या कफ के रोगियों को वसंत ऋतु में वर्ष में एक बार ही वमन कर्म कराना चाहिए। शरद ऋतु में स्वस्थ व्यक्ति या पित्त रोगियों को विरेचन कराना चाहिए और मानसून से पहले बस्ती कर्म करवाने से वात रोग नहीं होते। पंचकर्म सं बैक्टीरिया संक्रमण नहीं होता।

Posted By: Prashant Pandey

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