इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि, Dharma Indore News। जीवन में दो मौके कभी नहीं छोड़ना चाहिए। पहले जिन बिंब की स्थापना करने का और दूसरा ग्रंथ प्रकाशन करने अवसर। इन दोनों कार्य से महापुण्य का बंध होता है। जिनवाणी का कभी अविनय नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति जिनवाणी का अविनय करते हैं उसकी बुध्दि खराब होने में अधिक समय नहीं लगता। जिनवाणी को कभी गीले में नहीं रखना चाहिए और उस पर अक्षत भी नहीं चढ़ाना चाहिए।

यह बात श्रमणाचार्य विमदसागर महाराज ने श्री भक्तामर सम्यक ज्ञान शिविर के छठे दिन शनिवार को कही। गुमास्ता नगर जैन मंदिर में दिगम्बर जैन समाज गुमास्ता नगर, नेमीनाथ महिला मंडल गुमास्ता नगर और पुलक मंच परिवार द्वारा यह ज्ञान शिविर आयोजित किया जा रहा है। इसमें विमदसागर महाराज ने मानतुंगाचार्य द्वारा रचित श्री भक्तामर जी के छठवें काव्य के प्रत्येक शब्द की व्याख्या बहुत ही सरल शब्दों में की। उन्होंने कहा कि यह काव्य सरस्वती प्रदायक काव्य है। जो व्यक्ति भगवान की भक्ति करता है उसकी बुद्धि कभी खराब नही होती। उस पर सरस्वती की कृपा रहती है। जो मुनि को शास्त्र दान करते है उनकी बुद्धि कभी खराब नहीं हो सकती। आयोजन में शांतिलाल सोगानी के परिवार ने मांगलिक कार्य संपन्न कराए।

जीव हत्या न हो इसलिए करते हैं चार्तुमास

संतश्री दिव्यानंद सूरीश्वर महाराज का समन्वय आत्म कल्याण चातुर्मास सेवा, समर्पण, सद्भावना के माध्यम से पक्खी प्रतिक्रमण करके प्रारंभ हुआ। इस अवसर पर सूरीश्वर महाराज ने कहा कि पूरे देश में जितने जैन साधु- साध्वी हैं वे अस चार्तुमास के लिए एक स्थान पर धर्म आराधना, साधना, उपासना, तप-जप करने के लिए अग्रसर हो जाते हैं। इन चार महीनों में बरसात अत्यधिक होने के कारण सूक्ष्म जीव उत्पन्ना हो जाते हैं और वे हमारे कारण मरें नहीं इसलिए चार्तुमास किया जाता है। जैन धर्म में अहिंसा परम धर्म है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में यह तीसरा चार्तुमास है। कोविड के कारण नियमों का पालन सजगता पूर्वक करें। दर्शन वंदना करने के लिए आने वाले भक्त हेतु इन नियमों पर विशेष ध्यान दें। जीवन है तो व्यक्ति धर्म, आराधना, साधना, उपासना कर सकता है।

Posted By: gajendra.nagar

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