इंदौर। नईदुनिया प्रतिनिधि

प्रदेश में कृषि और वस्त्र उद्योग के बाद तीसरा प्रमुख सेगमेंट दवा उद्योग है। पिछले ग्लोबल समिट में सरकार ने जो आंकड़ा दिया था, वह 1.5 अरब डॉलर बताया गया था। माना यह जा रहा है अब यह दो अरब डॉलर से अधिक है।

इंदौर संभाग को प्रदेश का सबसे बड़ा दवा उत्पादक क्षेत्र माना जाता है। पीथमपुर को इस उत्पादन का हब माना जाता है। यहां छोटी-बड़ी 100 से ज्यादा इकाइयां कार्य करती हैं। इनमें प्रमुख ल्यूपिन, माइलन, इपका सहित अन्य प्रमुख कंपनियां हैं। ड्रग मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन ने दवा उद्योगों को दो भागों में विभाजित किया है। पहला, जिसमें देश की प्रमुख बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों को शामिल किया गया है। इनका प्रमुख काम नई दवाइयों का निर्माण और निर्यात करना है। इस क्षेत्र में रोजगार देने में इन कंपनियों का प्रमुख योगदान रहता है। इनमें बड़ी मात्रा में उत्पादन किया जाता है। ये कंपनियां एक ही यूनिट में कई प्रकार की अलग-अलग दवाइयां बनाती हैं। इसके बाद आती है लघु दवा उद्योग इकाई। यह प्रायः छोटे स्तर पर उत्पादन का कार्य करती है। इस समय प्रदेश में 70 से 75 लघु उद्योग की इकाइयां काम कर रही हैं। इनका उद्देश्य प्रमुख रूप से सरकारी टेंडर को लेकर दवाइयों का निर्माण कर उनकी पूर्ति करना होता है। इसके साथ ही यह दवाइयों का निर्यात भी करती हैं। इस उद्योग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग एक लाख से अधिक लोग रोजगार पा रहे हैं।

प्रस्तावितः

ग्लोबल समिट 2016 में प्रदेश में पीपीपी मॉडल के अंतर्गत 181 एकड़ का बायोटेक्निकल पार्क प्रस्तावित किया गया था। हालांकि फिलहाल यह नहीं बन पाया है।

प्रदेश में दवा उद्योग का इतिहास

दवा उद्योग का क्षेत्र शुरुआत से ही प्रदेश के प्रमुख उद्योग इंदौर बड़े दवा बाजार के रूप में जाना जाता है। 1990 के दशक में इंदौर एवं प्रदेश का नाम दवा निर्माण के क्षेत्र में देश में अग्रणी स्थान पर रहा है। तब इंदौर में 400 से 500 एवं प्रदेश में 650 इकाइयां कार्यरत थीं। इनमें गोलियां, कैप्सूल और नई दवा का फॉर्मूला बनाने का काम किया जाता है।

मांग : डब्ल्यूएचओ, जीएमपी सर्टिफिकेट व दस करोड़ टर्नओवर की शर्त को खत्म हो

1. प्रदेश की सरकारी खरीदी में टेंडर के लिए डब्ल्यूएचओ, जीएमपी का सर्टिफिकेट एवं दस करोड़ टर्नओवर की शर्त समाप्त की जाए।

2. दवा उद्योग को सिंगल विंडो सिस्टम के अंतर्गत जोड़ा जाए।

3. प्रदेश सरकार को अपनी लाइसेंसिंग संबंधित प्रणाली में बदलाव करना चाहिए।

4. प्रदेश के लघु दवा उद्योग को किराए पर दी गई जमीन को किराया मुक्त किया जाए।

5. डेवलपमेंट शुल्क में की गई वृद्धि कम की जाए।

सुझावः नई यूनिट के लिए तत्काल एनओसी बाध्यता खत्म हो

1. प्रदेश में नई यूनिट लगाने वालों को तुरंत एनओसी की आवश्यकता न पड़े। गुजरात में यह नियम तीन साल बाद लागू होता है।

2. नए निवेश को आकर्षित करने के लिए औषधि प्रशासन को कुछ नियमों में बदलाव करना चाहिए।

3. प्रदेश की क्रय नीति में प्रावधान करके लघु इकाइयों को 10 से 15 प्रतिशत तक मूल्य में छूट दी जा सकती है।

4. नई इकाइयों को जमीन की दरों में छूट प्रदान करना चाहिए।

क्रय नीति में बदलाव करें

सरकार को अपनी क्रय नीति में बदलाव करना चाहिए और डब्ल्यूएचओ जीएमपी और दस करोड़ रुपए टर्नओवर की शर्त में खत्म करना चाहिए, ताकि लघु इकाइयों को टेंडर मिल सके।

हिमांशु शाह, अध्यक्ष, मप्र स्मॉल स्केल ड्रग्स मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन

पुरानी इकाइयों पर भी ध्यान दें

प्रदेश सरकार को नए निवेश के साथ साथ पुरानी इकाइयों पर ध्यान देना चाहिए ताकि उन्हें परेशानियों का सामना न करना पड़े। उन्हें भी सरकारी मदद मिल सके।

अमित चावला, सचिव, एमपी स्मॉल स्केल ड्रग्स मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन

इंडस्ट्रियल एरिया विकसित करने से पहले प्लान करें

इंडस्ट्रियल एरिया डेवलप करने के दौरान प्लान करना चाहिए। इसके अभाव में करोड़ों-अरबांें का राजस्व नुकसान होता है। एमएसएमई की ओर से जो सुविधाएं इकाइयों को प्रदान की जाती हैं, वही सुविधाएं प्रदेश सरकार द्वारा प्रदेश में स्थापित इकाई को प्रदान की जाए।

डॉ. जेके सराफ, फाउंडर मेंबर, एमपी स्मॉल स्केल ड्रग्स मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन