उदय प्रताप सिंह, इंदौर (नईदुनिया)। इंदौर में खाने- पीने के शौकीनों की पसंदीदा जगह 'छप्पन दुकान" के दुकानदारों ने सिंगल यूज प्लास्टिक पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए विशेष कदम उठाए हैं। अब यहां पर डिस्पोजेबल प्लेट व गिलास का उपयोग नहीं होता है। लोगों को हाथ साफ करने के लिए टिशू पेपर तक नहीं दिया जाता। यही वजह है कि इंदौर ही नहीं, बाहर से आने वाले लोग भी छप्पन की तारीफ करते नहीं थकते।

पहले नगर निगम की गाड़ी दिन में चार बार सूखा कचरा एकत्र करने के लिए आती थी। उस समय रोज करीब 500 किलो सूखा कचरा निकलता था। डिस्पोजेबल के उपयोग पर रोक के बाद अब रोज 100 किलो ही निकलता है। इसमें रेपर, कागज, पैकिंग सामग्री, पेपर स्ट्रा होते हैं। निगम की गाड़ी दिन में एक बार ही सूखा कचरा ले जाती है।

शहर में आए गोवा इंस्टीटयूट आफ मैनेजमेंट के छात्र शंभु शंकर, अरिदंम सिन्हा ने बताया कि छप्पन दुकान परिसर में हमें कहीं भी डिस्पोजेबल कप व प्लेट दिखाई नहीं दिए। टिशू पेपर मांगा तो वह भी नहीं मिला। दिल्ली की मानवी खट्टर ने बताया कि दिल्ली स्ट्रीट फूड की दुकानों पर आज भी प्लास्टिक कप व चम्मच मिल रहे हैं। इंदौर इस मामले में तारीफ के काबिल है।

जागरूकता का असर, नहीं दिख रहा डिस्पोजेबल व पालीबैग

एमएसआइटी दिल्ली के छात्र रजत नयनवार व निष्ठा बाली ने बताया कि इंदौर के लोग जागरूक हैं। इस वजह से यहां पर डिस्पोजेबल व प्लास्टिक पर रोक दिख रही है। शहर में यहां-वहां कचरा या डिस्पोजेबल फेंका हुआ नहीं दिखा। छप्पन पर नारियल दुकान वाले ने भी कहा कि पानी पीने के बाद नारियल को हमारे काउंटर पर ही रखकर जाएं। लोगों के पास पालीथिन के बजाय कपड़े के झोले ही दिख रहे हैं।

स्टील की कटोरी व चम्मच का उपयोग

विजय चाट के संचालक मृदुल ठाकर ने बताया कि पहले हम लोगों को कागज के दोने में कचौरी, पेटिस व अन्य सामग्री देते थे। इससे काफी कचरा एकत्र होता था। इसके बाद पत्ते से बने दोनों का उपयोग किया। अब हमने स्टील की 1500 कटोरियां व चम्मच खरीदे हैं। दुकान में बर्तन धुलाई की व्यवस्था की। इस तरह अब स्टील कटोरी व चम्मच का उपयोग कर रहे हैं। चटनी भी सिल्वर फाइल वाली थैली में दे रहे हैं।

कागज के बजाय स्टील के गिलास में चाय

येवले चाय के संचालक सुमितमनचंदानी ने बताया कि पहले कागज के कप में चाय देते थे। अब स्टील के गिलास में देते हैं। लोगों से कहते हैं कि वे गिलास काउंटर पर ही रखकर जाएं। हमने इसके लिए गिलास की संख्या भी बढ़ाई है। जो लोग डिस्पोजेबल में चाय मांगते हैं, हम उन्हें मना कर देते हैं।

पुराने पैटर्न पर फिर लौटे

मधुरम स्वीट्स के संचालक श्याम शर्मा ने कहा कि पहले भी खाने पीने के आयटम स्टील के बर्तनों में दिए जाते थे। बाद में डिस्पोजेबल का चलन बढ़ा। अब पुन: पुराने पैटर्न पर ही स्टील के बर्तनों का उपयोग हुआ। इस प्रयास से सूखे कचरे में भी कमी आएगी।

छप्पन परिसर में डिस्पोजल पर पूरी तरह रोक

छप्पन दुकान व्यापारी संघ के अध्यक्ष गुंजन शर्मा का कहना है कि छप्पन परिसर में डिस्पोजेबल पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। नारियल पानी व शीतल पेय के लिए पेपर स्ट्रा का उपयोग हो रहा है। आइस्क्रीम पार्लर वाले भी एक्रेलिक के बर्तन व लकड़ी से बनी चम्मच का उपयोग कर रहे हैं। जो चाय दुकानदार कुल्हड़ का उपयोग करते हैं, उन्होंने उसके लिए अलग से कंटेनर रखा है और उसमें एकत्र कुल्हड़ वे खुद ही नष्ट करते हैं। पहले लोग जगह-जगह डिस्पोजेबल फैलाकर चले जाते थे, लेकिन स्टील की प्लेट व कटोरी के उपयोग से अब इस तरह का कचरा नहीं दिखता।

Posted By: Hemraj Yadav

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close