इंदौर। विशेष प्रतिनिधि । नईदुनिया ने 12 फरवरी के अंक में कंडों की होली जलाइए, गोशालाओं की लाखों गायों का खर्चा खुद ही निकल जाएगा शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी। इसको लेकर समाजिक संगठन, पर्यावरणविद, सरकारी विभाग, व्यापारी एसोसिएशन और कई सोसाइटी ने रुचि दिखाई है। सकारात्मक प्रतिक्रियाओं के सम्मान में नईदुनिया जागरुकता अभियान शुरू कर रहा है। आप भी इसका हिस्सा बनें और लकड़ी के बजाय कड़ों की होली जलाकर दूषित हो चुके पर्यावरण को शुद्ध करने की दिशा में योगदान दें।

कंडे जलाने से आसपास के वातावरण में फैले विषाणु (एअरबॉर्न बैक्टीरिया) नष्ट हो जाते हैं। गौविज्ञान अनुसंधान केंद्र का दावा है कि कंडों के धुएं से एक निश्चित अवधि के लिए आसपास का वातावरण 80 फीसदी शुद्ध हो जाता है। ऐसे में न सिर्फ पर्यावरण और अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए, बल्कि प्रदेशभर की 664 गोशालाओं में रह रही सवा लाख गायों के भोजन के लिए इस बार कंडों की होली जलाएं।

गोबर के कंडों से हवन और अग्निहोत्र से वातावरण शुद्ध होने के दावे वेद-पुराणों में मिलते हैं। नागपुर के गौविज्ञान अनुसंधान केंद्र में इसके वैज्ञानिक पहलू पर कई शोध भी हुए हैं। केंद्र के संचालक सुनील मानसिंहा बताते हैं, कंडे के धुएं से हवा में फैले विषाणु नष्ट हो जाते हैं।

वैज्ञानिक डॉ.चंदशेखर नौटियाल के राष्ट्रीय- अतंर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित शोध पेपर से यह साबित होता है। लगभग 13 साल पहले शिमोगा में श्री राम सहस्त्र यज्ञ में नेशनल एनवायरमेंट इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर एअर क्वालिटी चेक की गई तो यहां की हवा ज्यादा शुद्ध पाई गई। होली जलाते वक्त भी पूजा के दौरान उसमें घी, अक्षत आदि डाला ही जाता है। ऐसे में वातावरण शुद्ध होना स्वाभाविक है।

कंडों की होली जलाने को गौविज्ञान केंद्र के सचिव सुरेश ढबले मास फ्यूमिगेशन का नाम देते हैं। होली ठंड से गर्मी की ओर जाने का मौसम है यानी ऋतुओं का संधिकाल। इसमें बैक्टीरिया ज्यादा पनपते हैं, जिसे खत्म करने के लिए यह बेहतर उपाय है।

60 मिनट में घट गई 94 फीसदी बैक्टीरिया की संख्या

वैज्ञानिक डॉ. नौटियाल बताते हैं, मैंने शोध के लिए एक कमरा चुना। हवन से पहले वहां के वातावरण में फैले बैक्टीरिया और अन्य विषाणुओं की जानकारी जुटाई। लगभग एक महीने तक शोध करने पर पाया कि उस कमरे में एक घंटे तक गोबर के कंडे में हवन सामग्री डालकर धुआं करने से 60 मिनट में बैक्टीरिया की मात्रा 94 फीसदी तक घट गई। यह भी पाया कि एक बार में धुएं का असर 24 घंटे तक रहत है।

एक्रोलीन नामक कंपाउंड हवा को करता है शुद्ध

शहर के पर्यावरणविद् प्रोफेसर ओपी जोशी बताते हैं, लकड़ी की तुलना में गोबर से कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड का उत्सर्जन बहुत कम होता है। हवन के समय जब घी डाला जाता है तो एक्रोलीन नामक एक कंपाउंड बनता है जो हवा को शुद्ध करता है।

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