Geeta Jayanti 2022 इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि। गीता कर्मों की श्रेष्ठता पर बल देने वाला अनुपम ग्रंथ है। हमारे जैसे कर्म होंगे, फल भी वैसे ही मिलेंगे। गीता निष्काम भाव से कर्म करने की प्रेरणा देती है। यह कल्याणकारी ग्रंथ है। इसके अनुसरण से जीव सुख और शांति की प्राप्ति होती है।

यह बात स्वामी देवकीनंदन दास ने कही। वे सात दिनी गीता जयंती महोत्सव में गीता भवन में संबोधित कर रहे थे। आगरा से आए स्वामी हरि योगी ने कहा कि गीता अदभुत ग्रंथ है, जो युद्ध के मैदान में रचा गया। यह साक्षात भगवान श्रीकृष्ण की वाणी है, जो नित्य नूतन अनुभूति कराती है। भदौही से आए पं. सुरेश शरण रामायणी ने कहा कि आज का अखबार कल पुराना हो जाता है, लेकिन गीता कभी पुरानी नहीं होती। यह भगवान की ऐसी रचना है, जो जितनी बार पढ़ी जाए, उतनी बार नया संदेश देती है। इतिहास साक्षी है कि बड़े से बड़े अपराधी और दुराचारी का भी उद्धार हुआ है, जिसने भगवान की भक्ति और भजन का आश्रय लिया है। भजन चतुरता से नहीं, भक्ति भाव से करना चाहिए।

हरिद्वार के श्रवण मुनि ने कहा कि कलियुग में भगवान नाम का संकीर्तन कुछ पल के लिए भी कर लेंगे तो कल्याण हो जाएगा। हम सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की भावना वाले लोग हैं। कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भगवान जिसके सारथी बन जाते हैं, उसकी विजयश्री में की संदेह नहीं होता। इसी तरह हम भी अपने जीवन रथ की बागडोर भगवान के हाथों में सौंप देंगे तो हमारी भी विजयश्री सुनिश्चित हो जाएगी। सच्चा सुख प्रभु के चरणों में ही मिलेगा, लेकिन हम संसार के साधनों में ढूंढ रहे हैं। हरिद्वार के ही स्वामी सर्वेश चेतन्य ने कहा कि अपने घर में हम भोग विलास की चाहे जितनी सामग्री बाजार से खरीद सकते हैं, लेकिन मन की शांति नहीं खरीद सकते। बचपन में दूध नहीं पीने वाले बच्चों को माताएं डराती हैं कि दूध नहीं पीओगे तो बाबा आ जाएगा। ऐसा बच्चा बड़ा होने पर साधु-संतों के पास जाने में भी डरता है। संतों का सानिध्य मिले बिना विवेक का प्राप्ति नहीं होगी और जब तक विवेक नहीं मिलेगा, तब तक हम पशु तुल्य ही माने जाएंगे।

रामकृष्ण मिशन इंदौर के सचिव स्वामी निर्विकारानंद ने कहा कि मानव जीवन का प्रमुख उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति है, भोग विलास नहीं। अन्य सभी योनियों में भोग को प्राथमिकता दी गई है। केवल मनुष्य ही ऐसा जीव है, जिसे ईश्वर की प्राप्ति का लक्ष्य मिला है। यह चिंतन का विषय है कि हम कहां से आएं हैं और कहां जाएंगे। याद रखें कि संसार में जो कुछ है, ईश्वर के सिवाय कुछ नहीं है। ईश्वर की सत्ता ही सर्वोपरि है। असल में हम बाहरी या संसारी रिश्तों में बंधे हुए हैं। हमारा स्वभाव और चरित्र वैसा ही बनेगा, जैसी हम संगत करेंगे। दुर्जनों का संग हमें भी अपराधिक श्रेणी का बना देता है। इसीलिए हमारे सभी धर्मग्रंथों में सत्संग को प्राथमिकता दी गई है। मन ही बंधन का भी कारण है और मुक्त का भी। मन ही विचार और संस्कार हैं। मन का अलग से कोई अस्तित्व नहीं होता। संकल्प करें कि हम अपने जीवन में सत्संग को भी प्राथमिकता देंगे।

Posted By: Sameer Deshpande

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