-भगवान के वाणी स्वरूप का होता पूजन

Janmashtami 2022: रामकृष्ण मुले, इंदौर। विभिन्न मतों व पंथों को मानने वाले शहर के प्राचीन श्रीकृष्ण मंदिर अपनी विशेष पूजन पद्धति और भोग के लिए पहचाने जाते हैं। ऐसे ही प्रणामी संप्रदाय के गोराकुंड स्थित 102 वर्ष पुराने राधाकृष्ण मंदिर में 400 वर्ष पुराने ग्रंथों को पोशाक, मोर-मुकुट पहनाकर चांदी के सिंहासन पर विराजित कर राधाकृष्ण का स्वरूप दिया गया है। राधाकृष्ण का स्वरूप संप्रदाय के ग्रंथ तारतम वाणी और श्रीमद्भगवद्गीता को दिया गया है। ग्रंथ में वेद, पुराण, श्रीमद्भगवद्गीता और कुरान का सार समाहित है। यहां भगवान का हर दिन पांच बार पूजन होता है और पान का भोग लगाया जाता है।

मंदिर का निर्माण 1920 में 40 बाय 120 वर्गफीट में काले पत्थर से किया गया था। मंदिर के साथ गोशाला का संचालन भी किया जाता है। इस प्राचीन मंदिर से स्थानीय 1200 परिवार जुड़े हैं। संप्रदाय को मानने वाले अमेरिका, नेपाल, भूटान और आस्ट्रेलिया में भी निवास करते हैं। मंदिर का संचालन सात लोगों की कमेटी करती है। इंदौर के अलावा उज्जैन में भी प्रणामी संप्रदाय के दो मंदिर हैं। पुजारी कमल तिवारी बताते हैं कि यहां प्रतिदिन पांच समय पूजन किया जाता है। पान का भोग विशेष रूप से लगाया जाता है।

शास्त्रों में मूर्ति के आठ स्वरूप माने गए हैं। गीता में भगवान की वाणी है इसलिए ग्रंथ के रूप में गीता का पूजन होता है। दूसरा ग्रंथ संप्रदाय के संस्थापक गुरु प्राणनाथ द्वारा लिखा गया है। दोनों ग्रंथों को स्थापित कर सिंहासन पर विराजित किया गया है। इन्हें राधा-श्रीकृष्ण की पोशाक और मोर मुकुट पहनाया गया है।

महानुभाव पंथ :

महानुभाव पंथ को मानने वाले राजवाड़ा के बांके बिहारी मंदिर का निर्माण 1832 के पहले किया गया। तपस्विनी विमलाबाई विराट बताती हैं कि सूबेदार मल्हारराव होलकर की प्रथम पत्नी हरकूबाई इस पंथ को मानती थीं। उन्हें राजवाड़ा से भगवान के दर्शन हों, इसलिए इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था। मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की श्यामवर्णी कसौटी पत्थर की मूर्ति है।

वैष्णवमत :

वैष्णवमत को मानने वालों के लिए खजूरी बाजार स्थित 233 साल पुराना यशोदा माता मंदिर आस्था का केंद्र है। इसमें माता यशोदा की गोद में भगवान श्रीकृष्ण विराजमान हैं। दूसरी तरफ भगवान श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर लेकर खड़े हैं और आस-पास राधा-रुक्मिणी विराजमान हैं। पं. महेंद्र दीक्षित बताते हैं कि यह मूर्तियां जयपुर से इंदौर बैलगाड़ी में चालीस दिनों में लाई गई थीं। यहां संतान प्राप्ति के लिए जन्माष्टमी पर गोद भराई होती है।

Posted By: Sameer Deshpande

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