अनहद नाद/ ईश्वर शर्मा

कोरोना संक्रमण से हो रही मौतों के कारण इन दिनों माहौल ऐसा है कि वाट्सएप पर किसी का फोटो देखो तो पहली नजर में यही लगता है कि 'बाबूजी प्रभु को प्यारे हो गए।' इसी माहौल के बीच बीते दिनों इंदौर में सक्रिय एक समाज के वाट्सएप ग्रुप पर एक सदस्य ने समाज के लिए बड़ा दान देने वाले एक दानदाता की फोटो डाली। नीचे लिखा भी कि इन सज्जन ने समाज के लिए अपना अमूल्य योगदान दिया है। लोगों ने इस 'अमूल्य योगदान' को 'अंतिम योगदान' मान लिया। बस फिर क्या था, एक ने लिखा 'दिवंगत बाबूजी को श्रद्धांजलि' तो फिर सबने धड़ाधड़ 'ओम शांति, ओम शांति' लिखना शुरू कर दिया। बहुत देर बाद पता चला कि बाबूजी जिंदा हैं और उन्हें श्रद्धांजलि नहीं आदरांजलि देना है। मुझे तो डर है कि बाबूजी अब समाज वालों से अपना दान का पैसा वापस न मांग लें।

चीनी विषाणु से लड़ रहे साहित्य अकादमी के निदेशक

इन दिनों कोरोना संक्रमण का प्रसार फिर तेज हो गया। इस बार तो इस सूक्ष्म जीवाणु ने ऐसे लोगों को भी चपेट में ले लिया, जिनकी चेतना बड़ी विराट है। हुआ यूं कि बीते सप्ताह मप्र साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे कोरोना संक्रमित हो गए। वे हुए तो स्वाभाविक रूप से उनके स्वजन भी संक्रमण की चपेट में आ गए। डॉ. दवे इन दिनों क्वारंटाइन हैं और चीन से आए इस सूक्ष्म विषाणु से लड़ रहे हैं। इस युद्ध में उनकी जीत सुनिश्चित है क्योंकि उन्हेें चीनी विषाणुओं से लड़ने का अनुभव है। वे भारतीय संस्कृति को बच्चों तक पहुंचाने वाली पत्रिका 'देवपुत्र' संपादन के जरिए बीते करीब दो-तीन दशक से चीनी विषाणुओं अर्थात वामपंथ, माओवाद आदि की वैचारिक चुनौतियों से लड़ ही रहे हैं। हां, उनके संक्रमित होने से इस बार इतना नुकसान जरूर हुआ है कि साहित्य अकादमी की फाइलें अटक गई हैं।

हम दोस्तों की वफा से डरते हैं...

दुश्मनों की जफा का खौफ नहीं हम दोस्तों की वफा से डरते हैं। बीते हफ्ते इंदौर के कुछ लेखकों ने हफीज बनारसी के इस शे'र की यादें ताजा करवा दीं। हुआ यूं कि जब छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने हमारे जांबाज सुरक्षा बलों के जवानों पर हमला किया, तब भले पूरा देश रोया, लेकिन कुछ धूर्त, चालाक और देशद्रोही प्रजाति के जंतु खुश भी हुए। दुर्भाग्य तो यह कि ऐसे लोगों में सिर्फ दिल्ली में बैठे वामपंथी या माओवादी समर्थक लोग ही नहीं थे बल्कि मध्य प्रदेश के इंदौर के भी कुछ लोग शामिल थे। इन्होंने नक्सलियों की कायरता का 'जश्न' मनाते हुए बाकायदा एक वाट्सएप गु्रप बनाया- नाम रखा 'खेला हो गया'। इसमें इन्होंने दिनभर नक्सलियों के समर्थन में कविताएं लिखीं, वामपंथियों के लाल सलाम वाले वाक्य शेयर किए। मगर इन लोमड़ों का दुर्भाग्य रहा कि इनके एक साथी ने ये बातें लीक कर दीं। ये शे'र शायद ऐसों के लिए ही लिखा गया है।

मूर्खता के यज्ञ में जब सबने डाली मूर्खाहुति

यूं तो अखबारों में छपने वाले स्तंभों की अपनी पठनीयता और लोकप्रियता होती है, किंतु बीते सप्ताह व्यंग्य के एक स्तंभ की लोकप्रियता नए स्वरूप में सामने आई। हुआ यूं कि 01 अप्रैल को मूर्ख दिवस पर व्यंग्यकारों के एक प्रतिष्ठित वाट्सएप समूह में चुहलबाजी शुरू हुई। एक तो व्यंग्यकार, ऊपर से 01 अप्रैल का मौका...इसलिए मूर्खता के यज्ञ में सबने अपनी मूर्खाहुति डाली और सहज हास्य, अद्भुत आनंद का नया वितान रच डाला। एक सज्जन ने तो इस अवसर को अपने तरीके से कुछ अलग ही दिलचस्प बना दिया। हुआ यूं कि उन्होंने अखबार में छपने वाले प्रतिष्ठित व्यंग्य कालम में बहुत दिनों से अपनी रचना न छपने में भी व्यंग्य ढूंढ लिया। उन्होंने घर के कम्प्यूटर पर उस लोकप्रिय स्तंभ जैसा फार्मेट बनाया और खुद की एक रचना उसमें डालकर हूबहू ऐसा बना दिया, मानो अखबार में छपा हो। उस छपे-अनछपे पर फिर बहुत देर तक चर्चा चली।

Posted By: Sameer Deshpande

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