Indore News इंदौर, नईदुुनिया प्रतिनिधि। ब्रिटिशकाल में नगर में बनी खूबसूरत और भव्य इमारत समय के साथ न केवल संवर रही है अपितु बदलते दौर के साथ कदमताल मिलाते हुए नए आयाम भी रचने जा रही है। देश की स्वतंत्रता के लिए हुए संग्राम की साक्षी रही इस धरोहर के प्रांगण में कला-संस्कृति, सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बने हैं।

हम बात कर रहे हैं गांधी हाल की, जो 1904 में करीब साढ़े छह करोड़ रुपये में बनकर तैयार हुआ था। इसके जीर्णोद्धार और आज की जरूरत के अनुरूप सुविधाएं देने के लिए पौने दस करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। स्मार्ट सिटी के तहत हो रहे इस कार्य में केवल नगर की धरोहर को पहले जैसा स्वरूप ही नहीं दिया जा रहा, अपितु परिसर में सुविधाएं बढ़ाई जा रही हैं जिससे अतीत से भविष्य तक की गाथा यहां खुशी-खुशी फल-फूल सके।

निर्माण के समय गांधी हाल का नाम किंग एडवर्ड हाल था, जिसे स्वतंत्रता के बाद महात्मा गांधी को समर्पित करते हुए महात्मा गांधी टाउनहाल रखा गया और आज यह गांधी हाल के नाम से जाना जाता है। अंग्रेज वास्तुकार जेजे स्टीवेंस जरूर इसके वास्तुकार रहे, लेकिन उन्होंने निर्माण शैली राजपूताना रखी। सफेद सिवनी और पाटन के पत्थरों से बने इस भवन को इंडो-गौथिक शैली में बनाया गया है। इसे कई लोग घंटाघर भी कहते हैं और इसकी वजह है यहां की आयताकार मीनार पर लगी घड़ी, जो दूर से ही नजर आती है और राहगीरों को भी समय की कीमत का संदेश देती है।

छुट्टी की शाम बिताने का खूबसूरत ठीया

सावन के झूले से भादो के मेले, गुलाब की प्रदर्शनी से किताबों की दुनिया तक, संगीत की सभा से नृत्य के रंग तक और गंभीर मुद्दों पर हुई चर्चाओं से लेकर रंगकर्म की बातों तक का सफर इस इमारत ने न केवल देखा है, अपितु उसे जिया भी है। यही वह इमारत है जिसके प्रांगण में न जाने कितनी फिल्मों की शूटिंग हुई है और देश के नामी कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति के जरिए इसे इतराने का कई बार मौका दिया। इमारत के साथ खूबसूरत बगीचा और झूले करीब 2 दशक पहले तक छुट्टी बिताने के लिए बच्चों को परिवार सहित अपने पास बुला ही लेते थे। सावन में झूलों की पेंग और महिलाओं की हंसी-ठिठौली से गुलजार रहने वाले इस परिसर में उन वीर सपूतों के चित्र भी लगे हैं, जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों की भी आहुति दे दी।

118 साल पुरानी धरोहर को संवारने की कोशिश

स्मार्ट सिटी के सीईओ ऋषव गुप्ता के अनुसार गांधी हाल परिसर को करीब पौने दस करोड़ में संवारा जा रहा है। इसके तहत न केवल हाल का जीर्णोद्धार हुआ, अपितु यहां रंगकर्मियों के लिए ओपन थियेटर भी बना और अब महात्मा गांधी के जीवन से जुड़े दृश्यों को भी संजोने की कोशिश है। 118 साल पुरानी यह धरोहर आज की जरूरत के अनुरूप निखारना है।

Posted By: Sameer Deshpande

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