इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि, IIT Indore। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) इंदौर ने हेलिकोबैक्टर पाइलोरी जीवाणु और एप्सटीन बार विषाणु के सह-संक्रमण से होने वाले अक्रामक पेट के कैंसर और इसके इलाज में दवाओं के बेअसर होने की क्रियाविधि को समझने के लिए एक अध्ययन किया है जो कि अमेरिकन सोसाइटी आफ माइक्रोबायोलाजी के एमस्फीयर में प्रकाशित किया गया है। यह अध्ययन आइआइटी इंदौर में इंफेक्शन बायो इंजीनियरिंग ग्रुप के प्रमुख डा. हेमचंद्र झा ने अपने शोध छात्रों धर्मेंद्र कश्यप, बुद्धदेव बराल और स्वेता जखमोला साथ ही असम के डा. अनिल कुमार सिंह के साथ मिलकर किया है। यह अध्ययन भारत सरकार की वित्तीय सहायता से किया गया है।

यह अपने तरह का पहला अध्ययन है जिसमे शोध टीम ने पाया है कि हेलिकोबैक्टर पाइलोरी और एप्सटीन बार विषाणु सह-संक्रमण के दौरान पेट के कैंसर को बढ़ाने के लिए व्यक्ति के ही एक प्रोटीन का इस्तेमाल करता है जिसका नाम गणकैरिन है। इसके अलावा महत्वपूर्ण बात यह है कि सह-संक्रमण होने के कारण गैस्ट्रिक कैंसर के होने की समयावधि को यह घटाकर दो से पांच साल कर देता है जो कि इनके अकेले के संक्रमण से सात से 10 साल की तुलना में बहुत कम है। प्रयोग के दौरान जब गणकैरिन जीन की कापी बनाकर गैस्ट्रिक कोशिका में बाहर से डाला गया तो पाया गया कि कैंसर के गुण जैसे कोशिका का एक जगह से दूसरे जगह जाना, कोशिका का तेजी से अपनी कापी बनाना, कोशिकाओं द्वारा समूह का बनाना और कोशिका का संकेत का आदान-प्रदान बहुत अक्रामक तरीके से बढ़ गए। इसके बाद गणकैरिन के जीन को जब गैस्ट्रिक कोशिका से हटा दिया गया तो पाया गया कि पेट की कोशिका के कैंसर का गुण सामान्य से भी कम हो गया।

Posted By: gajendra.nagar

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