Independence Day 2020 : हर्षलसिंह राठौर, इंदौर (नईदुनिया रिपोर्टर)। शहर में हर साल एक कैंप आयोजित होता है। दस दिनी इस कैंप में सिर्फ कला की बात होती है। कभी-कभी साल में दो बार भी यह कैंप आयोजित हो जाता है। भारत के विभिन्न प्रातों की पारंपरिक चित्रकला को सीखने-सिखाने का सिलसिला चलता है। सीखने वाले शहरी लोग होते हैं, जबकि सिखाने वाले वे ग्रामीण होते हैं, जो अपनी सदियों पुरानी कला को आज भी सहेजे हुए हैं।

20 साल से जारी सीखने-सिखाने के इस क्रम में कभी तो युवा कलाकारों को अपनी कला शहरवासियों को सिखाने का मौका मिलता है तो कभी शहर के युवा सुदूर गांवों से आए उम्रदराज कलाकारों का फन सीखने की कोशिश करते हैं। लुप्त होती कला को एक बार फिर लोकप्रिय बनाने की कोशिश शहर की वरिष्ठ चित्रकार शुभा वैद्य कर रही हैं।

वर्ष 2000 से जारी इस प्रयास के तहत अब तक कुल 26 कलाओं का प्रशिक्षण शिविर इंदौर में आयोजित हो चुका है। जिसमें कोलकाता का शोला आर्ट, गुजरात की राठवा पेंटिंग, झाबुआ की पिथोरा पेंटिंग, ओडिशा के पट्टचित्र, बिहार की मधुबनी, महाराष्ट्र की वारली सहित कुल 26 कलाएं शामिल हैं, जिन्हें अब तक हजारों लोग सीख चुके हैं। शुभा वैद्य बताती हैं एक चित्रकार होने के कारण हमेशा नया सीखने की उत्सुकता बनी रहती है।

जब भोपाल के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय की सदस्यता मिली तो वहां आयोजित होने वाले आर्ट कैंप "करो और सीखो" में शामिल होने का मौका मिला। तब महसूस हुआ कि इस संग्रहालय में तो इस तरह के कई आर्ट कैंप आयोजित होते हैं, पर इंदौर के कलाप्रेमी इसका लाभ नहीं ले पाते। तब मैंने इंदौर में भी यह कैंप आयोजित करने का निर्णय लिया। कभी संग्रहालय के साथ तो कभी खुद शहर में कैंप आयोजित करना शुरू किया। स्वयं के द्वारा ही दर्जनभर से ज्यादा कैंप मैं यहां लगा चुकी हूं जिसमें हर उम्र के लोग शामिल होते हैं।

इन कैंप के लिए उदयपुर से मिनिएचर पेंटिंग सिखाने सतीश कुमार, महाराष्ट्र से वारली सिखाने मानकीबाई और रघु, बिहार से मधुबनी सिखाने यशोदा, भीलवाड़ा से फड पेंटिंग सिखाने प्रकाश और मुकुल जोशी, महिदपुर से ग्लास पेंटिंग सिखाने विजयालक्ष्मी, कोलकाता से शोला आर्ट सिखाने श्यामलाल, पश्चिम बंगाल से पट्टचित्र सिखाने मणिमाला आदि कलाकार यहां आए।कैंप दस दिन का इसलिए आयोजित किया जाता है, ताकि प्रशिक्षणार्थी न केवल कलाकृतियां बनाना सीखें, बल्कि उनका इतिहास, मान्यता, कलाकारों की स्थिति, दिनचर्या और क्षेत्र विशेष के बारे में भी जान सकें।

इन कैंप का प्रभाव यह हुआ कि अब शहर के लोग भी यह जानने लगे कि हर लोककला की अपनी मान्यता होती है, जिसे खास वक्त पर और खास तरीके से बनाया जाता है। यही नहीं कई लोक कलाकारों की मूल कृतियां भी प्रशिक्षणार्थियों ने खरीदी, जिससे उन कलाकारों को आर्थिक सहायता और प्रोत्साहन भी मिला। इन कार्यशालाओं में प्रोफेशनल आर्टिस्ट के साथ शौकिया कलाकार, आर्किटेक्ट, इंटीरियर डिजाइनर, फैशन डिजाइनर आदि ने भी भाग लिया है।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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