मुकेश मंगल. इंदौर (नईदुनिया)। महिला अपराधों को लेकर सरकार और जांच एजेंसी कितनी गंभीर हैं, इसका सुबूत है पुलिसिया पन्नों पर दर्ज सरकारी आंकड़े। रिपोर्ट के मुताबिक दुष्कर्म-छेड़छाड़, पॉक्सो एक्ट, जानलेवा हमला जैसे गंभीर मामलों के 82 प्रतिशत अपराधी बरी हो रहे हैं।

दिल्ली के निर्भयाकांड के बाद केंद्र ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश जारी कर कहा था कि सरकार महिला अपराधों की विवेचना और कोर्ट ट्रायल पर ध्यान दें। पुलिस मुख्यालय ने एडीजी स्तर के अधिकारी को जिम्मा सौंपकर थाना स्तर पर मॉनिटरिंग सेल बनाने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद पिछले वर्ष महिला अपराधों के 82 प्रतिशत गंभीर मामलों के आरोपित बरी हो गए। 2019 में जनवरी से दिसंबर तक जिला न्यायालय ने 820 केसों में फैसला सुनाया, जिसमें से 668 प्रकरणों के आरोपित बरी कर दिए गए। इसमें गौर करने वाली बात तो यह है कि 356 केसों में पीड़िताओं ने ही समझौता कर लिया। इसमें 23 मामले तो दुष्कर्म के शामिल हैं। कानून के जानकारों के मुताबिक कई महिलाओं को पुलिस कालचर रवैया और न्यायालय के चक्कर काटने की मजबूरी में समझौता करना पड़ता है।

पॉक्सो एक्ट : क्या फर्जी केस दर्ज करती है पुलिस

पॉक्स यानी बच्चियों से अश्लील हरकत के आंकड़ों से लगता है पुलिस फर्जी प्रकरण दर्ज करती है। पिछले साल पुलिस ने 414 केस न्यायालय में प्रस्तुत किए थे, जबकि 629 मामले पूर्व से फैसले के इंतजार में थे। न्यायालय ने 275 केसों का निराकरण किया जिनमें से 46 मामलों के आरोपितों को बरी कर दिया गया। यहां भी 173 मामलों में पीड़िताओं द्वारा समझौता पेश किया गया है। इन गंभीर मामलों में मुलजिमों के छूटने के पीछे भी पुलिस की लापरवाही मुख्य वजह है।

आसानी से कैसे बरी हो जाते हैं आरोपित?

- ज्यादातर मामलों में पुलिस मुलजिम की गिरफ्तारी में गड़बड़ी कर देती है। रोजनामचा में रिपोर्ट और आमद रवानगी का फायदा उठाकर वकील पुलिस की थ्योरी फर्जी साबित कर देते हैं।

- पिछले कुछ वर्षों में लिवइन रिलेशनशिप के मामलों में दुष्कर्म के केस दर्ज हुए हैं। पुलिस प्रकरण तो दर्ज कर लेती है लेकिन पीड़िता द्वारा बताई घटना न्यायालय में टिक नहीं पाती और आरोपित छूट जाते हैं।

- लिवइन रिलेशनशिप के ज्यादातर मामलों में पुलिस (विवेचक) आरोपित की गिरफ्तारी तो लेती है लेकिन उसका झुकाव आरोपित की तरफ रहता है। वह उसे केस की खामियां बताकर बरी होने के रास्ते भी दिखा देती है। कई मामलों में विवेचक की मध्यस्थता से दोनों पक्ष समझौता पेश कर देते हैं।

बयान बदलने से छूटे आरोपित

पुलिस का प्रयास रहता है कि ज्यादा से ज्यादा मामलों में आरोपितों को सजा हो। ज्यादातर मामलों में फरियादी द्वारा बयान बदलने के कारण आरोपित छूट जाते हैं।

- हरिनारायणाचारी मिश्र, डीआइजी

कमजोर पड़ जाते हैं केस

ऐसे मामलों में ज्यादातर केस कोर्ट में लगने के बाद कमजोर पड़ जाते हैं क्योंकि साक्ष्य मजबूत नहीं रहते। प्रेम प्रसंग से जुड़े मामलों में विवाद होने पर मामला पुलिस तक जाता है और एफआइआर हो जाती है, लेकिन बाद में फरियादी द्वारा ही रुचि नहीं दिखाई जाती है।

-राहुल पैठे, वरिष्ठ अभिभाषक

Posted By: dinesh.sharma

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