Indore Dr. Jitendra Vyas Column : डा. जितेंद्र व्यास, इंदौर (नईदुनिया)। नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा के उम्मीदवारों से ज्यादा उनकी जीत की चिंता विधायक कर रहे हैं। विधायक दिन-रात इसी कोशिश में जुटे हैं कि उनकी विधानसभा से ज्यादा से ज्यादा पार्षद जीत जाएं और महापौर पद के उम्मीदवार को अच्छी लीड मिल जाए। दरअसल, विधायकों को पार्टी ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि आने वाले विधानसभा चुनाव में उनका भविष्य नगरीय निकाय चुनाव ही तय करेगा। इसके बाद अपने कम समर्थकों को टिकट मिलने और महापौर पद के लिए खुद की उम्मीदवारी पर ध्यान नहीं दिए जाने जैसे मुद्दों पर नाराज चल रहे विधायक सब भुलाकर मैदान में कूद पड़े हैं। जिन क्षेत्रों में भाजपा को पिछले चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था, वहां से टिकट की इच्छा रखने वाले दावेदार यही दुआ कर रहे हैं, उनके क्षेत्र से ज्यादा से ज्यादा पार्षद जीत जाएं ताकि उनकी सियासत पर आंच न आए।

न खुदा मिला न विसाले सनम

नगरीय निकाय चुनाव की घोषणा होते ही भाजपा में महापौर पद के जितने दावेदार सामने आए, उसने संगठन पदाधिकारियों के साथ-साथ बड़े नेताओं को भी परेशानी में डाल दिया। वरिष्ठ पार्षदों से लेकर युवा नेताओं तक हर कोई टिकट के लिए भोपाल-दिल्ली एक किए हुए था। पिछली परिषद के वरिष्ठ पार्षद दिलीप शर्मा और अजय सिंह नरूका ने दिल्ली-भोपाल के हर संभावित दरवाजे पर दस्तक दी। लंबी खींचतान के बाद भी महापौर के लिए तो टिकट नहीं मिला, पार्षद पद के लिए भी पार्टी ने विचार नहीं किया। नाराज होकर निर्दलीय फार्म भी भरा लेकिन पार्टी नेताओं की समझाइश पर वापस भी ले लिया। दावेदार जहां अब 'बहुत लड़ लिए, अब संगठन का काम करेंगे" कह रहे हैं तो समर्थक दबी जुबान कह रहे हैं कि इससे तो पार्षद के टिकट के लिए ही प्रयास करते. . . कुछ तो हाथ में रहता।

तीन देवियों के टिकट से सियासत हो रही 'लाल"

पार्षद के लिए टिकट वितरण की उलझन नाम वापसी के कुछ मिनट पहले तक भी चलती रही, लेकिन इस बार टिकट की सियासत ने सबको उलझन में डाल दिया। सांसद शंकर लालवानी भी इससे बच नहीं पाए। दरअसल, लालवानी अपनी तीन समर्थकों कंचन गिदवानी, मुद्रा शास्त्री और संध्या यादव को टिकट दिलवाने में कामयाब हो गए, लेकिन जिन्हें टिकट नहीं मिल पाए या जिनकी दावेदारी खारिज कर तीन देवियों को टिकट दिए गए, वे सांसदजी से नाराज हो गए। विधानसभा क्षेत्र क्रमांक एक, चार और पांच के गुस्साए भाजपाई यह कहते घूम रहे हैं कि हमारे क्षेत्रोें में अनाश्यक हस्तक्षेप से नुकसान हो गया। नाराजगी के स्वर टीम लालवानी के कानों तक भी पहुंचते ही मान-मनौव्वल का दौर शुरू हो गया। सबको साधने में निपुण लालवानी को सियासत से ज्यादा अपनी 'कला" पर भरोसा है। चुनाव के पहले तक तो नाराज नेताओं को मना ही लेंगे।

ये राजनीति है. . . हर कदम पर सूरत भी बदलती है और सीरत भी

बदलाव के दौर से गुजर रहे भाजपा संगठन में युवा भाजपा का नारा चुनाव के पहले इतने जोर-शोर से गूंज रहा था कि अधेड़ उम्र के भाजपाई खुद को अलग-थलग सा महसूस कर रहे थे। उधर संगठन और नगर परिषद में काम कर रहे युवा दुगनी ताकत से इसलिए काम में जुटे थे ताकि उन्हें और बेहतर मौके मिल सके। लेकिन वो राजनीति ही क्या जो पलभर में सूरत और सीरत न बदल ले। नगरीय निकाय चुनाव में भी ऐसा ही हुआ। पार्षदों की सूची जारी हुई तो भरत पारख, दीपक जैन टीनू जैसे कई युवा पार्षद दूसरी बार टिकट पाने से वंचित रह गए। ठगा महसूस कर रहे ऐसा पूर्व पाषदों को भले ही पार्टी ने आरक्षण रोस्टर, विधायकों के फार्मूले का हवाला देकर समझा दिया हो, लेकिन कार्यकर्ता जरूर ये कहते सुने जा रहे हैं कि राजनीति में सिर्फ काम करने से टिकट नहीं मिलता।

Posted By: Hemraj Yadav

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