Indore Dr. Jitendra Vyas Column : डा. जितेंद्र व्यास, इंदौर (नईदुनिया)। राजनीति में मर्मभेदी शब्दबाण खूब चलाए जाते हैं। मंजे हुए राजनेता इशारों-इशारों में ऐसी बातें कह जाते हैं जो सामान्य होकर भी गूढ़ संदेश दे जाती हैं। पिछले दिनों इंदौर के पूर्वी क्षेत्र में कथा के दौरान हुए वाकये को ही लीजिए। कथा में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, क्षेत्र क्रमांक दो के विधायक रमेश मेंदोला, नगर अध्यक्ष गौरण रणदिवे सहित कई राजनेता मौजूद थे। विजयवर्गीय ने मंच पर पहुंचकर पहले तो भजन सुनाए और फिर मंच से ही कहा- अब सब नृत्य करेंगे। फिर विधायक रमेश मेंदोला और रणदिवे को संबोधित करते हुए कहा कि चलो राजनीति के उत्तर-दक्षिण ध्रुव आप दोनों भी नृत्य करोगे। इसके बाद दोनों नेता तो भजनों पर थिरकने लगे, लेकिन वहां मौजूद कई लोग यह तलाशने में जुट गए कि विजयवर्गीय ने उत्तर-दक्षिण ध्रुव शब्द का इस्तेमाल क्यों किया? जिन्हें समझ आ गया, वे सिर्फ मुस्कुरा कर रह गए।

खूब हुई सूबे की सियासत... अब बस्ती आवाज देती है

विधानसभा चुनाव में अभी भले ही डेढ़ साल शेष हैं, लेकिन विधायकों को अपने-अपने क्षेत्र से उठ रही 'पुकार" सुनाई देने लगी है। सबसे ज्यादा परेशान वे विधायक हैं, जिनके पास संगठन से मिली अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी हैं। इंदौर के राऊ विधानसभा क्षेत्र के विधायक जीतू पटवारी साढ़े तीन साल प्रदेश की राजनीति में खासे सक्रिय रहे। उन्होंने कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाने के साथ सियासी उथल-पुथल और सरकार की घेराबंदी के लिए यहां-वहां दौड़ भी खूब लगाई, लेकिन अब उनका पूरा फोकस विधानसभा क्षेत्र पर ही है। इन दिनों विधानसभा का शहरी क्षेत्र हो या ग्रामीण, पटवारी हर छोटे-बड़े आयोजन में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते नजर आ रहे हैं। उनकी ओर से पार्टी नेताओं को संदेश दे दिया गया है कि अब कुछ समय माफ करें। सूबे की सियासत में ही उलझे रहेंगे तो क्षेत्र पर ध्यान कब देंगे?

बस इतनी सी आरजू है मेरी...

अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण पर स्थिति स्पष्ट होने के बाद नगर निगम चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। लंबे समय से घरों में बैठे भाजपा नेताओं ने कलफ लगे कुर्ते और पायजामे तैयार करवाना शुरू कर दिए हैं। भले ही अभी तय नहीं हुआ कि महापौर पद के लिए आरक्षण की स्थिति क्या होगी, लेकिन जिस रास्ते से टिकट आता है, दावेदारों ने उसे 'बुहारना"शुरू कर दिया है। पार्षद से लेकर महापौर तक का टिकट चाहने वाले क्षेत्र के सार्वजनिक आयोजनों में दिनभर शिरकत कर रहे हैं। साथ ही अपने राजनीतिक क्षत्रपों को याद दिलाना भी नहीं भूल रहे हैं कि राजनीति करते-करते कितने साल बीत गए। इस बार मेरी छोटी सी आरजू तो पूरी होनी ही चाहिए। वार्ड और मंडल स्तर पर हो रही संगठन की बैठकों में पहुंचने वाले विधायक और प्रदेश पदाधिकारी इन दिनों ऐसे ही आग्रह से खासे परेशान हैं। उनकी मजबूरी यह है कि न इन्कार कर सकते हैं और न इकारार।

कल सियासत में थी मोहब्बत, अब मोहब्बत में सियासत

भाजपा का संगठन इन दिनों पीढ़ी परिवर्तन के मंत्र के साथ युवा भाजपा और पुरानी भाजपा के बीच करवट ले रहा है। इंदौर में पिछले दिनों बनी कार्यकारिणी में जगह पाने वाले युवा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू होते ही 'भाई साहब" कहे जाने लगे हैं, लेकिन इस परिवर्तन को वे अनुभवी नेता नहीं पचा पा रहे हैं जिनकी अंगुली पड़कर युवा नेताओं ने भाई साहब बनने तक का सफर तय किया है। इधर नए-नए बने पदाधिकारियों को पुराने पदाधिकारियों से वो सम्मान नहीं मिलता, जो टिकट की आस में बैठे कार्यकर्ताओं से मिल रहा है। यही कारण है कि नए भाई साहब लोग 'अनुभव" को सबसे पहले ठिकाने लगाने में जुटे हैं। पिछले दिनों विधानसभा क्षेत्रों में हुई कई बैठकों में यह 'मोहब्बत" कार्यकर्ताओं को नजर भी आई। इस उपेक्षा से दुखी एक पूर्व उपाध्यक्ष की टिप्पणी थी- सियासत ने सम्मान और मोहब्बत को भी नहीं छोड़ा।

Posted By: Hemraj Yadav

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