Darbar E Khas Column डा. जितेंद्र व्यास, इंदौर (नईदुनिया)। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इन दिनों जिस 'फारम" में है, उसने अच्छे-अच्छे अफसरों का यह भ्रम दूर कर दिया है कि वे सत्ता और संगठन से नजदीकी की वजह से नजर में नहीं आएंगे। पिछले एक माह से मुख्यमंत्री की शायद ही ऐसी कोई सभा या आयोजन बचा हो, जहां जनता की शिकायत पर किसी न किसी अफसर की 'बलि" नहीं चढ़ी हो। ग्वालियर महाकौशल के बाद अब मामा के दौरे मालवा-निमाड़ में शुरू हो रहे हैं। इससे घबराए अफसर मुख्यमंत्री सचिवालय या सीएम हाउस से जुड़े अपने संपर्कों को फोन घनघनाते हैं। विषय एक ही रहता है कि इस हफ्ते सीएम साहब के दौरे कहां-कहां होने वाले हैं। जैसे ही किसी के हाथ जानकारी लगती है, वो तुरंत अपने आसपास के जिलों के अफसरों को तुरंत सतर्क कर देता है। चिंता वाजिब भी है, चुनावी साल में मामा का फारम कहीं अफसरों का फारम खराब न कर दे।

मौके की जमीन पर मेंदोला का नया 'नौलखा

हुकमचंद मिल के बरसों से उलझे मामले को बीती निगम परिषद की बैठक में सुलझाने का प्रयास हुआ था। तब ठोस कदम उठाने का प्रस्ताव पारित होते ही जमीन के जोड़-घटाव में जुटे जादूगर गिनती करने में जुट गए थे। वे अभी गिनती भी पूरी नहीं कर पाए थे कि क्षेत्र क्रमांक दो के विधायक रमेश मेंदोला ने वहां पहुंचकर मिल की जमीन को लेकर चर्चा शुरू कर दी। चर्चा के बीच ही यह कयास लगाए जाने लगे कि या तो कमर्शियल काम्प्लेक्स बनाने या फिर बागीचा बनाने की बात कहेंगे। लेकिन मेंदोला ने यहां नया नौलखा बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि नौलखा में कभी नौ लाख पेड़ हुआ करते थे, उसी तरह यहां भी नौ लाख पेड़ लगाकर पूरा क्षेत्र हरित कर दिया जाए। महापौर ने भी प्रस्ताव पर सहमति दे दी। अब चर्चा इस बात की है कि इस बेशकीमती जमीन पर वनक्षेत्र बनाने का गणित देने वाला कौन है।

कायदे में रहोगे, तो फायदे में रहोगे

यह जुमला इन दिनों इंदौर पुलिस के अफसरों के बीच खूब बोला जा रहा है। मामला कुछ यूं है कि चुनावी साल में तबादलों का मौसम आने की तैयारी में है। पूरे प्रदेश में इंदौर ऐसा इकलौता शहर है जहां थाना प्रभारी से लेकर एसीपी-डीसीपी तक के किसी भी पद के लिए सबसे ज्यादा खींचतान होती है। ढाई साल से ज्यादा वक्त बिता चुके अफसर तो चला-चली की बेला में हैं ही, लेकिन जिन्हें आए अभी सालभर भी पूरा नहीं हुआ, वे इस चिंता में है कि बदलाव की बयार कहीं उन्हें भी न बहा ले जाए। कानून-व्यवस्था से ज्यादा चिंता उन्हें इस बात की रहती है कि उनके 'सिंहासन" के चारों पैर सलामत हैं या नहीं। मुख्यधारा में आने की राह देख रहे एक अधिकारी चिंतातुर अफसरों को एक ही जुमला कहते मिलते हैं- कायदे में रहोगे, तो ही फायदे में रहोगे। अब इस कायदे और फायदे के अर्थ मैदानी अफसर अपने-अपने स्तर पर तलाश रहे हैं।

चाहे राजनीति ही क्यों न हो, इंदौर रहेगा नंबर वन ही

स्वच्छता में छह बार देश का नंबर वन शहर बन चुके इंदौर के लोग खुद को नंबर वन बताने-दिखाने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते। अब गुजरात चुनाव को ही लीजिए। भाजपा को वहां मिले प्रचंड बहुमत के बीच मध्य प्रदेश की सीमावर्ती विधानसभा सीटों का जोड़-घटाव भी इंदौर में बैठे कार्यकर्ता दिनभर लगाते रहे। दरअसल, प्रदेश उपाध्यक्ष और पूर्व विधायक जीतू जिराती को इन सीमावर्ती सीटों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। यहां भाजपा 37 में से 34 सीटें जीत गई। एक सीट भाजपा के बागी प्रत्याशी ने जीत ली। जिराती बीते ढाई महीने से इंदौरी टीम के साथ वहां मैदान संभाले हुए थे। जीत का आंकड़ा आते ही जिराती समर्थकों ने तुरंत अपने गुजराती मित्रों के फोन घनघनाना शुरू कर दिए। फोन उठाते ही संवाद की शुरुआत ही इस तरह हो रही थी - 'देखा इंदौरियों का कमाल, जहां हम हैं वहां सबकुछ नंबर वन तो होगा ही।

Posted By: Hemraj Yadav

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