इंदौर से अश्विन बख्शी। देश में अंधत्व का सबसे बड़ा कारण मोतियाबिंद है। इसका ऑपरेशन तकनीकी दक्षता के इस दौर में बहुत जटिल भी नहीं है लेकिन आए दिन इसके ऑपरेशन में लापरवाही या संक्रमण की वजह से आंखों की रोशनी चले जाने के मामले सामने आते रहे हैं। सरकारी नेत्र शिविरों में तो अनदेखी के मामले ज्यादा आते रहे हैं लेकिन अब निजी अस्पताल भी इससे अछूते नहीं रहे। हाल ही में इंदौर के इंदौर आई हॉस्पीटल में 13 मरीजों को इसी दौर से गुजरना पड़ा। मरीजों के बेहतर इलाज के लिए राज्य सरकार की ओर से चेन्नई के प्रसिद्ध शंकर नेत्रालय के विशेषज्ञ डॉ. राजीव रमन को बुलाया गया। उन्होंने इस काम की फीस भी नहीं ली। प्रस्तुत है मोतियाबिंद के ऑपरेशन में ऐसी लापरवाही और अन्य मुद्दों पर डॉ. रमन से विशेष बातचीत...

अत्याधुनिक तकनीक आने के बाद भी मोतियाबिंद ऑपरेशन के दौरान संक्रमण हो रहा है। इसकी क्या वजह सामने आ रही है?

- पहले ऑपरेशन के बाद 10 दिनों तक मरीज की आंख में पट्टी बांधकर रखी जाती थी, अब वह समय नहीं रहा। पहले इंजेक्शन देकर रखा जा जाता था, अब इससे कई एडवांस तकनीक आ चुकी हैं लेकिन इन सबके बाद भी संक्रमण रोकने के लिए सावधानी बहुत जरूरी है। उपकरण, आंखों के ड्रॉप, ऑपरेशन के दौरान अंगुली लगने या अन्य कारण से संक्रमण हो सकता है। टेक्नोलॉजी कोई भी हो जोखिम बना रहेगा। सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि जो प्रोटोकॉल बनाए गए हैं, उनका पालन हो। उपकरणों की सफाई, दवाइयों की जांच करना, हवा के नमूने लेकर जांच करना जरूरी है।

मोतियाबिंद के कितने ऑपरेशन के बाद ओटी (ऑपरेशन थिएटर) को संक्रमण रहित करना जरूरी होता है?

- जब भी ऑपरेशन थिएटर की सफाई होती है तो सभी सामानों के सैंपल भेजे जाते हैं। जब तक तीन रिपोर्ट नेगेटिव नहीं आती तब तक ऑपरेशन चालू नहीं किए जाते। इसके बाद रोज की सफाई का ध्यान रखना जरूरी है। हर सप्ताह सैंपल जांच के लिए भेजा जाना जरूरी होता है। उसमें किसी तरह का बैक्टीरिया मिलने पर ओटी बंद कर दिया जाना चाहिए। हर ओटी में इस प्रोटोकॉल का पालन करना जरूरी है।

ऑपरेशन के दौरान कौन सी खामियां आंख खराब कर सकती है?

- आंख के ऑपरेशन के दौरान कई चुनौतियां होती है। लेंस पीछे गिर जाना, कॉर्निया क्षतिग्रस्त हो जाना, पर्दा क्षतिग्रस्त होना खतरनाक होता है। इंजेक्शन देने में थोड़ी सी गड़बड़ी हुई तो पर्दा क्षतिग्रस्त हो सकता है। संक्रमण डॉक्टर के नियंत्रण में नहीं है इसलिए ऑपरेशन के दौरान सावधानी बरतना जरूरी है।

दवाइयां या उपकरण कैसे संक्रमण का कारण बन सकते हैं?

- हर दवाई का अपना एक बैच होता है। एक बैच की दवाई एक साथ बनाई जाती है। वही दवा सभी जगहों पर बाजार में पहुंचती है। बनाते समय गड़बड़ी हो जाए या पैकिंग सही नहीं हो तो संक्रमण का खतरा रहता है। दूसरा, स्टोरेज में लीकेज या ट्रांसपोर्ट के दौरान डैमेज हो जाए तो संक्रमण का खतरा रहता है इसलिए हर स्तर पर सावधानी जरूरी है।

निशुल्क ऑपरेशन शिविर में ही इस तरह के मामले ज्यादा सामने आते हैं। क्या समूह में ऑपरेशन जरूरी है?

- समूह या शिविर में ऑपरेशन के लिए पांच से अधिक मरीज होना जरूरी है। शिविर लगाकर जो ऑपरेशन किए जाते हैं उनमें मरीजों की संख्या अधिक होती है। देश में आज भी अंधत्व का सबसे बड़ा कारण मोतियाबिंद ही है। इतने मरीज हैं कि डॉक्टर कम पड़ रहे हैं। गांव में 70 से 80 साल की उम्र के लोग रहते हैं। वे मोतियाबिंद का ऑपरेशन इसलिए नहीं कराते क्योंकि उन्हें कोई लाने वाला नहीं है। वहीं आर्थिक रूप से सक्षम न होना भी एक बड़ा कारण है। यदि शिविर बंद कर दिए जाएं तो कई लोग अपनी आंखें खो देंगे। कुछ गड़बड़ियों की वजह से पूरे शिविर बंद करना गलत है। हां, गाइडलाइन फॉलो कराना जरूरी है।

हर व्यक्ति आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होता कि वह निजी अस्पताल में इलाज करवाए। सरकारी अस्पताल ही सहारा हैं, ऐसे में क्या बदलाव किए जाने चाहिए?

- सरकार को चाहिए कि अधिक संख्या में सर्जन को प्रशिक्षित करे व इनकी संख्या बढ़ाई जाए। आज हमारे देश में 17 हजार लोगों पर एक नेत्र विशेषज्ञ है। ऐसे में सिर्फ सरकारी अस्पतालों में मोतियाबिंद के पूरे ऑपरेशन हो जाएं, यह संभव नहीं। डॉक्टरों की संख्या व इंफास्ट्रक्चर बढ़ाए जाने की जरूरत है। आज पूरे देश में 20 हजार एआईओएस (ऑल इंडिया ऑप्थेल्मोलॉजिकल सोसाइटी) सदस्य हैं। अन्य भी मिलाऐं तो 25 हजार ही हुए।

मध्य प्रदेश मूल के हैं डॉ. राजीव रमन

इंदौर में स्कूली शिक्षा। यहीं के एमजीएम मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस। सूरत से पोस्ट ग्रेजुएशन। आंख के पर्दे के इलाज में विशेषज्ञता हासिल करने चेन्नाई के शंकर नेत्रालय गए। वहां दो वर्ष प्रशिक्षण लिया। 12 साल वहां काम करने के बाद दो साल इंदौर में भी काम किया। कई शोध कार्य के अलावा डायबिटिज के कारण आंख के पर्दे पर पड़ने वाले प्रभाव पर शोध कर चुके हैं। जल्दी ही डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि यूके से मिलने वाली है। एक मशीन भी तैयार की है जो बगैर डॉक्टर डायबिटिज से आंख का पर्दा खराब होने की जानकारी देगी।

आंखों के इलाज के बारे में आंख खोल देने वाली सच्चाई

मप्र के करीब 35 जिलों में नेत्र विशेषज्ञ नहीं हैं। उनकी जगह पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल ऑफिसर (पीजीएमओ) आंख के मरीजों का इलाज व सर्जरी कर रहे हैं। प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में नेत्र विशेषज्ञ के कुल स्वीकृत 126 पदों में से सिर्फ 42 नेत्र विशेषज्ञ ही कार्यरत हैं। 84 पद रिक्त हैं। भोपाल जिला अस्पताल में नेत्र विशेषज्ञ के तीनों पद खाली हैं। यहां तीन पीजीएमओ काम कर रहे हैं। (स्रोत : स्वास्थ्य संचालनालय)

राष्ट्रीय अंधत्व निवारण कार्यक्रम का 77 फीसदी बजट ही उपयोग

मप्र में राष्ट्रीय अंधत्व निवारण कार्यक्रम का वित्त वर्ष 2018-19 का कुल बजट करीब 62 करोड़, 11 लाख 29 हजार रुपए का था। उसमें से 48 करोड़ दो लाख रुपए ही उपयोग हो पाया। यह बजट का 77.31 फीसदी है। बच्चों की आंखों की जांच और चश्मा उपलब्ध कराने में प्रस्तावित बजट का 59.99 प्रतिशत तो बुजुर्गों के आंखों की जांच और नए चश्मे के लिए प्रस्तावित बजट का 69.30 फीसदी खर्च हो पाया। सरकारी व जिला अस्पतालों में उपकरण, दवाइयों व अन्य सुविधाओं के लिए हर केस के लिए 450 रुपए का बजट होता है। सरकारी अस्पताल में करीब नौ फीसदी बजट ही उपयोग हुआ यानी इलाज कम ही हुआ है। (स्रोत : स्वास्थ्य संचालनालय)