इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि। इंदौर आई अस्पताल को लेकर राज्य सरकार ने सख्त रुख अपना लिया है। स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट ने यहां तक कहा है कि अस्पताल को मिली सरकारी जमीन की लीज निरस्त की जाएगी, लेकिन दिलचस्प पहलू यह है कि अस्पताल को अब तक जमीन की लीज ही मंजूर नहीं हुई है और अस्पताल बिना लीज के चल रहा है।

अस्पताल को वर्ष 1971 में एमओजी लाइन में करीब 75 हजार वर्गफीट शासकीय जमीन मिली थी। उस समय जमीन का अग्रिम कब्जा तो मिल गया, लेकिन अस्पताल की लीज का प्रस्ताव शासन के पास अब तक विचाराधीन है। यह मसला इसलिए और पेचीदा हो गया है कि अस्पताल की समिति की ओर से अब तक कोई दस्तावेज पेश नहीं किए गए।

अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि ट्रस्ट को 5707 वर्गफीट शासकीय जमीन आवंटित हुई थी, जिसका अग्रिम आधिपत्य मिला था। अस्पताल की मुख्य सड़क के दूसरी तरफ भी जमीन मिली थी, लेकिन वह जमीन अदला-बदली में इंदौर क्लॉथ मार्केट अस्पताल को दे दी गई। प्रशासन ने अस्पताल से जमीन की लीज से संबंधित सभी दस्तावेज मांगे हैं। इसके लिए सोमवार तक का समय दिया गया है। प्रशासन भी अपने दस्तावेज खंगाल रहा है।

जांच समिति ने लिए अस्पताल डायरेक्टर के बयान

रविवार को प्रशासन की जांच समिति के अध्यक्ष और अपर कलेक्टर कैलाश वानखेड़े, डॉ. प्रदीप गोयल और डॉ. आशुतोष शर्मा इंदौर आई अस्पताल पहुंचे। समिति ने अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. सुधीर महाशब्दे के बयान लिए। इस दौरान एसडीएम राकेश शर्मा, तहसीलदार मनीष श्रीवास्तव भी मौजूद थे। जांच समिति घटना के हर पहलू को बारीकी से देख रही है। इसमें अस्पताल में मरीजों के ऑपरेशन, देखभाल, ऑपरेशन थिएटर और आंखों में डाली गई दवा आदि की जांच शामिल है। ऑपरेशन के बाद आंखों में डाले गए ड्रॉप और अन्य दवाओं के नमूने जांच के लिए ड्रग इंस्पेक्टरों ने लिए हैं।

जांच के बाद साफ होगी स्थिति

इंदौर आई अस्पताल को नजूल भूमि की लीज के प्रकरण की जांच करवा रहे हैं। जमीन का मामला है, इसलिए जांच के बाद ही स्थिति साफ होगी। अधिक संक्रमण के कारण दो मरीजों की आंख निकालने की जानकारी मिली है, जांच में इस बिंदु को भी शामिल किया गया है। - लोकेश कुमार जाटव, कलेक्टर